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Tuesday, December 15, 2020

आत्मदर्शन

मैंने यहाँ इंसान का हर रूप देखा
कभी बाह्य, कभी आंतरिक, 
बदलता हुआ हर स्वरूप देखा
स्वच्छ, निर्मल नीर सा प्रफुल्लित मन देखा
छल, कपट, माया से लिप्त - आदमी का गिरगिट जैसा बदलता रंग देखा

मेहनत, ईमानदारी और लगन से आसमाँ की ऊँचाइयाँ छूते हुए भी देखा
बेईमानी और चापलूसी के चौले में 
पद -  प्रतिष्ठा का ताज पहनते भी देखा

कहीं सुख - सुविधा और परिवार के साथ रह कर भी 
 इंसान को हर वक़्त अकेला और बीमार देखा
तो कहीं अपनी परवाह न करते हुए दूसरों की मदद और सेवा के लिए सदा तत्पर खड़ा, दिल का अमीर  देखा

किसी को अपनी मर्जी से जीवन जीने का लुत्फ उठाते देखा
किसी को जीवन के हर मोड़ पर शिकायत करते देखा
किसी को औरों की खुशी में खुश होते देखा
किसी को हर पल ईर्ष्या और स्वार्थ की चिता में जलते देखा

ये सब तो है कर्मों का लेखा-जोखा
वर्ना हर दिल में है वास प्रेम, करुणा और वात्सल्य का 
बस आवरण है उन पर सदियों से ज़मी परतों का 
जिस दिन खुल  जाएगा इंसान के दिल का ये झरोखा अनुभव हो जाएगा आत्मदर्शन का 
उस दिन दिखाई देगा वो.. जो कभी किसी ने ना देखा 
वो दर्शन होगा अद्भुत और अनोखा.. 


अलका डांगी