कहाँ करते है अपने आने की आहट
धीमे-धीमे, कमजोर कर मन
जाने कब छीन लेते है
जीवन से चैन, सुकून और मुस्कुराहट
समय की भी है यह कैसी करवट
अपनी ही भावनाओं के घेरे में आदमी जाता भटक
कभी अकेलेपन का एहसास कभी नकारात्मक विचारों का जमघट
कभी तनहाई और लाचारी में रह जाता अपने आप में सिमट
हर पल बैचैनी और समय के इस चक्र से बाहर निकलने की छटपटाहट
ढूँढता हैं मन अंधेरे में रोशनी की एक किरण की झगमगाहट
किसी अपने का निरंतर साथ और प्रेम की चाहत
जहाँ ना हो कोई सवालों का घेरा न सलाह मशविरे की हरक़त
मजबूत सहारा बनकर अटल अविचल खड़ा रहे जैसे कोई पर्बत
समय के साथ हर तूफान से जूझ कर बाहर निकलने की मिल जाएगी तब हिम्मत
वक़्त लेगा फिर एक दिन करवट
चाहे परिस्थिति हो कितनी भी विकट
हारकर नहीं जीतकर रख देंगे हर बाजी पलट
आदमी स्वीकार जब करेगा मनोरोग को बेझिझक
अंतर्मन की शक्ति बहाल कर , लेगा हर स्थिति से भी एक दिन निपट
लौट आएँगी खुशियाँ निरस जीवन में
संग अपने लेकर फिर से चैन सुकून और मुस्कराहट !!
अलका डांगी