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Friday, September 25, 2020

' ना ' कहना सीखो !!

दुर्व्यवहार, दुराचार या हो अत्याचार
मूक रहकर मत करो स्वीकार 
आवाज उठाओ, न घबराओ, चाहे तो चीखो
बस एक बार निडर होकर 'ना' कहना सीखो.!

अजनबी हो या हो कोई रिश्तों से जुड़ा रिश्तेदार 
चुपचाप जुल्म सहन कर लो इतने भी न बनो लाचार ! 
देखा - अनदेखा मत करो, मत सहो, आगे बढ़ो
बस एक बार निडर होकर ' ना.' कहना सीखो ! 

सीमा - मर्यादा की रेखा कर रहा है ग़र कोई पार 
निःसंकोच उठा लो तुम भी अपना हथियार 
बुराई और कपट के खिलाफ लड़ों, मत झुको 
बस एक बार निडर होकर ' ना ' कहना सिखों.! 


अलका डांगी 





Friday, September 11, 2020

अनजाना मर्ज

अपने मापदंड और पूर्वाग्रहों से उसे मत आँकीए
उसकी मनःस्थिति समझने की कोशिश तो कीजिए
सलाह - मशवरा नहीं, उसे प्यार और हौसला दीजिए
वह टूट कर बिखर जाए उससे पहले उसे सम्भाल लीजिए 

न वह तन से बीमार है न मन से 
गुट रहा है वह हर पल अवसाद के अकेलेपन से 
सब साथ है फिर भी नहीं जानता क्यूँ 
घिरा हुआ है चिंता, घबराहट और खालीपन से
समझते हुए भी बेबस है और मजबूर है 
इस अनजाने मर्ज के भँवर की जकड़न से 

इस वक़्त अपना साथ दीजिए और उसका विश्वास जीतीए 
इस भँवर से बाहर निकालने में उसे हिम्मत दीजिए 
ये वक़्त भी गुजर जाएगा बस उसका हाथ थाम लीजिए 
हँसते मुस्कुराते हुए उसकी सुनी बगिया गुलजार कीजिए
टूटे - बिखरे हुए मन को जोड़कर फिर से उसका जीवन सँवार दीजिए 


अलका डांगी 



Thursday, September 10, 2020

क्या ज़रूरी है !!

क्या यहाँ काम करके जताना जरूरी है ! 
कुछ करो या न भी करो पर करने का दिखावा जरूरी है! 
दूसरों के काम को अपना बताकर 
श्रेय खुद ले जाना जरूरी है ! 
और इसी क्रम में दूसरों को नीचा दिखाकर
अपना सिक्का जमाना जरूरी है ! 

क्या यहाँ झूठी चाहत और अपनापन दिखाना जरूरी है ! 
सच्चे दिल से हो न हो पर एहसास दिलाना जरूरी है ! 
भीतर नफरत और कड़वाहट भरी है ! 
फिर भी प्रेम का नकाब चढ़ाना जरूरी है.! 

क्या यहाँ समाज के हर रीति रिवाज निभाना जरूरी है ! 
सही हो या गलत पर आडंबर अपनाना जरूरी है ! 
विद्रोह की आवाज उठे अगर तो 
संस्कारों की दुहाई देकर उसे दबाना जरूरी है ! 

नहीं.... 
क्यूँकी यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो 

दो रूप  नहीं धारण करते हैं 
जैसा मन है वैसा ही आचरण करते हैं 
गलती हो तो निःसंकोच स्वीकार करते हैं 
न किसीकी राह में रुकावट बनते हैं 
न मन में छल कपट की भावना रखते हैं 
भीड़ में न चलकर अपनी राह खुद तय करते हैं 

क्यूँ कि यहाँ सरल और निर्मल मन होना जरूरी है 
बाह्य और अंतर्मन एक होना जरूरी है 
जीवन सिर्फ जीना ही नहीं सफल और सार्थक बनाना जरूरी है 
और इंसान के मन में इन्सानियत होना जरूरी है 

अलका डांगी