शब्दों में इतनी ताकत होती है कि वह आदमी को हिम्मत भी दे सकता है और तोड़ भी सकता है ! इंसान जिसे अपना समझते हैं और जिससे प्रेम करते हैं उसके लिए सदा अनुकूल शब्दों का प्रयोग करने का प्रयत्न करते हैं और उसे प्रोत्साहन देते रहते हैं | वहीं जिससे ईर्ष्या होती है जिन्हें इंसान नापसंद करते हैं , जिसका बुरा चाहते हैं और अंदर से जिसके कारण असुरक्षित भावना से पीड़ित होते हैं उनके लिए वह प्रतिकूल शब्दों का प्रयोग करते हैं और अपने व्यंग्य वाले शब्दों का बाण चलाकर उसकी हँसी उड़ाते हैं, उसे सबके सामने आहत करने की कोशिश करते हैं , उसका आत्मविश्वास गिराने की कोशिश करते हैं और कभी-कभी मन ही मन खुशी की अनुभूति करते हैं |
वाणी पर संयम और शब्दों का चयन और मौन रहना बहुत कठिन होता है | कभी- कभी इंसान दिल से साफ और निर्मल होते हुए भी अपने शब्दों से किसी को जाने अनजाने आहत कर देते हैं वहीं ऐसे शातिर इंसान भी होते हैं जो अपने शब्दों में मधुरता घोल कर माया और कपट से लिप्त मीठे बोल बोलकर अपना मतलब सिद्ध करते हैं | ये भी गलत ही है |
फिर भी हकीकत यही है कि हर इंसान के शब्द और उसकी वाणी से उसकी प्रकृति की पहचान और एक छवि का निर्माण होता है | किसी न किसी रूप में परिवार और समाज के लिए इंसान के शब्द हितकारी या अहितकारी भी साबित होते है |
इंसान को जब अपने आराध्य और अपने कर्म पर पूर्ण विश्वास होने लगता है और ईश्वर और उसकी भक्ति के प्रति शत प्रतिशत समर्पण के भाव जागृत होते हैं तभी उसका मन निर्मल और निश्छल बनता है और उसके शब्द भी उतने ही स्वच्छ , निर्मल , मधुर और संयमित बन सकते हैं जिससे सभी की आत्मा को सुखद एहसास होता है |
अलका डांगी