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Tuesday, February 11, 2025

अनदेखा पहलू !!

अनदेखा पहलू. !! 

आदमी होना इतना आसान कहाँ होता है | पुरुषवाद और पैतृक सत्ता की जंजीरों में आदमी इस तरह जकड़ा होता है कि बाहर निकलने की कितनी भी कोशिश करें अपनी छाप मिटा नहीं पाता खासतौर से नारीवादी मानसिकता उसे समझने और स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती उनकी नजरें हर पल , हर वक्त उन पर घड़ी ही रहती है और अपने पूर्वाग्रहों से अपने  दृष्टिकोण से उन्हें आँकती रहती है |

यह बात सही है की एक समय था जब आदमी औरतों का शोषण करते थे,  हुकुम चलाते थे और उन्हें घर की दहलीज भी पार नहीं करने देते थे और पैतृक सत्ता का दुरुपयोग कर स्त्रियों को अपने अधिकार से वंचित रखते थे और यह भी हकीकत है कि इस मानसिकता से कई आदमी आज भी ग्रसित हैं और औरतों पर अपना अधिकार और हुकुम चलाना अपनी शान समझते हैं और इस सबसे बाहर निकलना भी नहीं चाहते  - चाहे वह पढ़े लिखे शहरी आदमी हो या किसी गाँव या पिछड़े हुए प्रदेश से हो | परंतु इसका खामियाजा एक साधारण आदमी को भी भुगतना पड़ता है जो समय के साथ काफी आगे बढ़ चुका है और अपने आप को और अपनी मानसिकता को बदलने की पूरी कोशिश कर रहा है  | स्त्रियों के सम्मान और उनके हक के लिए उनके साथ खड़े होने की पूरी कोशिश कर रहा है पर फिर भी हर वक़्त हर कदम पर उसे सम्भल कर रहना पड़ता है क्यूँ कि हकीकत में कई औरतें खुद भी पूर्वाग्रह की शिकार होती हैं और अपने नारीवाद का फायदा उठाकर आदमियों का शोषण करती है |जहाँ एक तरफ समानता की बात करती है वहीँ आदमी की स्वतंत्रता को अपने हाथ में लेना चाहती है और अपनी नारीवादी  दृष्टिकोण और सोच के कारण आदमी कितना भी स्वतंत्र विचार का हो और उसे पूर्ण सहयोग करें फिर भी नफरत का शिकार होता है | ऐसे आदमी की मनःस्थिति कोई समझ नहीं पाता ये बड़े दुःख की बात है  |

भारतीय संस्कृति में खास तौर पर आदमी हमेशा एक द्वंद्व में फंसा रहता है घर के बड़े बुजुर्ग उसका घर के कामों में सहयोग करना , बच्चों के पालन-पोषण में मदद करना , घर संभालना ,रसोईघर में काम करना जैसे कई काम जो पहले सिर्फ स्त्रियाँ करती थी अब स्वेच्छा से पुरुष करता भी है तो बड़े बुजुर्ग यह स्वीकार नहीं कर पाते या उनके सहमित्र और परिवार वाले जिनकी मानसिकता आज भी संकीर्ण है वह उनकी हँसी उड़ाते हैं और आदमी समाज के तानों और हँसी का शिकार होता है और मानसिक परेशानियों से गिरा रहता है | 
बहुत से स्त्रियाँ बड़ी मौका परस्त भी होती है आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर वह घर से बाहर रहना चाहती है..ना घर सम्हालना पसंद है  और ना नौकरी करना चाहती है  बस शॉपिंग करना , किटी पार्टी करना और दोस्तों के साथ गपशप करना, चाली चुगली करना, घूमना फिरना इसे ही नारीवादी,  आधुनिकता और स्वतंत्रता का नाम देती है  स्त्रियाँ तो अपना मन हो तो काम कमाई करें नहीं भी करें , करियर बनाएं नहीं भी बनाएं  जो कि आज के ज़माने में नामुमकिन है  , फिर भी उसकी तरफ कोई उंगली नहीं उठा सकता परंतु आदमी पर पूरे घर की जिम्मेदारी , परिवार की जिम्मेदारी और समाज की दृष्टि रहती है वह सपने में भी कुछ नहीं करने और घर बैठने का सोच नहीं सकता  | कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले पुरुषों के कारण स्त्रियों को कोई हक नहीं होता कि हर पुरुष को इस कटघरे में खड़ा कर उसे प्रताड़ित करें और पुरुष की कौम को बदनाम करे  |
स्त्री हो या पुरुष सबसे पहले इंसान होते हैं और दोनों को पूरा हक है कि वह अपना जीवन अपने तरीके से, पुरी स्वतंत्रता के साथ जियें बशर्ते एक दूसरे को भी उतना ही सम्मान दें जितना वो खुद  के लिए अपेक्षा रखते हैं किसी की स्वतंत्रता को  नियंत्रण करने और उस पर हावी होने की कोशिश नहीं करे ना ही एक दूसरे को स्त्रीत्व और पुरुषत्व के नाम से प्रताड़ित  करें | दोनों को एक दूसरे के परिवार का मान सम्मान और समाज में अपनी इज्जत और मर्यादा में रहकर अपना जीवन खुशी से जीना चाहिए और भावी पीढ़ी के लिए भी एक आदर्श मिसाल कायम करनी चाहिए |

अलका डांगी