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Saturday, November 27, 2021

चलो पहले इंसान बन जाते हैं !

चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

मन में भेदभाव की दृष्टि जगाने से पहले 
एक दूसरे के दिल में घृणा बढ़ाने से पहले 
प्रेम और विश्वास की डोर मजबूत बनाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

स्त्री-पुरुष को अलग-अलग तराजू में मापने से पहले 
कौन किससे बेहतर है ये साबित करने से पहले 
दोनों को त्याग और समर्पण का महत्व समझाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

संस्कृति और परंपराओं  के नाम पर आडंबर रचाने से पहले  
आधुनिकता और स्वतंत्रता की खिल्ली उड़ाने से पहले 
विचार और आचरण में ज़रूरी बदलाव लाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

कमजोर और मजबूर का शोषण करने से पहले 
नफरत और विद्रोह की ज्वाला उठने से पहले 
धर्म और ईमान की नींव मजबूत बनाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

अलका डांगी 










"आमची मुंबई "


आमची मुंबई  ! 

किसीकी जन्मभूमि है किसी की कर्म भूमि
किसी ने इसे अपनाया
किसी ने ठुकराया
इसके जैसी जिंदादिल वाली नहीं और कोई 
ये है हमारी अपनी - "आमची मुंबई" 

देश की आर्थिक राजधानी है 
गगनचुम्बी इमारतों और झोपड़पट्टीयों के आपसी सामंजस्य की निशानी है 
अरब सागर जैसे विशाल दिल में समा जाता है हर कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमचीमुंबई" 

दंगों ने इसका दिल बहुत धड़काया 
बॉम्ब विस्फोटों से धरती पर हड़कंप मचाया 
अपने - परायों का भेद दिखाकर खूब डराया 
फिर भी इसकी आत्मा डगमगा न सका कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमची मुंबई" 

कुदरत के प्रलय और कहर से जूझ चुकी है 
बीमारी महामारी से लड़कर फिर ऊपर उठी है 
राजनीति की शिकार होकर भी कभी नहीं झुकी है 
इसकी उन्नती प्रगति से जुड़े कदरदान कई 
ये तो है हमारी अपनी  - "आमची मुंबई "

सिनेजगत से अपनी अलग पहचान बनाई 
उद्योगपतियों ने इसकी शान और बढ़ाई 
हर व्यक्ति के कार्य को महत्ता दिलाई 
चाहे टैक्सी, ठेला या फिर डब्बे वाला क्यूँ न हो कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमची मुंबई" 

मायानगरी कहलाई जाती है इतना इसका आकर्षण 
एक बार देखने की तमन्ना रहती सभी के अंतर्मन 
सिद्धिविनायक और महालक्ष्मी के आशीर्वाद से हर पल निखर जाता यहाँ का जनजीवन 
इसके दरियादिल में बसना चाहता हर कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमची
मुंबई "

अलका डांगी

Thursday, November 18, 2021

सम्पूर्ण जीवन का सार है जिंदगी !

कभी सवाल तो कभी जवाब है जिंदगी 
अपने ही कर्मों का हिसाब-किताब है जिंदगी 
मानो तो कठिन समझो तो सरल 
दिल से जियो तो बेहिसाब है जिंदगी
हर पन्ना जैसे खुली किताब है जिंदगी 

दिल पर ले लिया तो तनाव है जिंदगी 
हँसते मुस्कराते चल पड़े तो अल्हड,चंचल बहाव है जिंदगी 
थोड़ी उलझी , थोड़ी सुलझी 
बनतीं - बिगड़ती , संवरती - निखरती 
नित नए रंग ढ़ंग बदलती 
उतार-चढाव , धूप-छांव से गुजरती 
जीने की चाह हो तो बेपनाह है जिंदगी 

अपनों का साथ हो तो प्रेम और प्रीत का अंबार है जिंदगी 
ग़म के साये भी है तो खुशियों का संसार है जिंदगी 
कभी हकीकत दर्शाती कभी ख्वाब सजाती 
ख्वाहिशों और तमन्नाओं का भंडार है जिंदगी 
हर पल , हर क्षण की अहमियत समझाती 
सम्पूर्ण जीवन का सार है जिंदगी 

अलका डांगी 










Tuesday, October 26, 2021

कर्त्तव्य बोध

हाँ ! वो बुजुर्ग हैं 
वो ज्येष्ठ नागरिक हैं 
तो क्या हुआ 
वो भी सीने में जवान दिल रखते हैं 
जीवन की रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर हो गई 
पर आज भी हँसने खेलने और मिलने झूलने के लिए उनके दिल उतने ही धड़कते हैं 

हाँ  !  वो सेवा निवृत्त हुए है
तो क्या हुआ 
कहीं और प्रवृत्त हुए हैं 
जिम्मेदारी के बोझ तले दबे हुए कुछ अधुरे ख्वाब, कुछ ख्वाहिशों को पूरा करने की मंशा रखते हैं 
किसी प्रकार अपने आप को व्यस्त रखने की हर संभव कोशिश करते हैं 
स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने की जद्दोजहद करते हैं 

 हाँ ! वो थक गए है 
कंधे थोड़े झुक गए हैं 
तो क्या हुआ 
जीवन भर की कड़ी मेहनत और उतार-चढाव के बाद शान से जीने का हक रखते हैं 
अपने तजुर्बे और मशवरो से सभी का मार्गदर्शन करते हैं 
परिवार और रिश्तों के लिए सब कुछ समर्पण करते हैं 

हाँ   !  वो बीमार है 
हालात से लाचार है 
कभी शिकायत, कभी चिड़चिड़ करते हैं 
तो क्या हुआ 
दो प्रेम के शब्द और कुछ वक़्त अपनों के साथ बिताने के लिए तरसते हैं 
और कहीं किसी पर बोझ न बन जाए 
इसलिए दिन-रात स्वस्थ रहने का भरसक प्रयत्न करते हैं 

हाँ  ! वो हमसे कुछ आशा कुछ उम्मीद रखते हैं 
अपने दुख - दर्द और लाचारी सुनी निगाहों से बयान करते हैं 
 तो चलो हम उनकी जीवन संध्या में प्रेम और विश्वास की रोशनी जगाएं 
उनकी व्यर्थ चिंता और डर के अंधेरे को दूर भगाएँ 
जिस सम्मान और स्वाभिमान से उनका जीवन गुजरा है 
वह यूँ ही कायम बना रहेगा ऐसा यक़ीन दिलाएं 
कि प्रेम और कर्त्तव्य बोध से उनकी हर साँस में शान्ति और सुकून पहुँचाए 

अलका डांगी 









Monday, September 27, 2021

मेरी नन्ही परी

मेरी नन्ही सी परी , देखो कैसी बड़ी हुई जा रही है 
मानो कल की ही बात हो 
रोती  , चीखती, कभी जिद्द पर चढ़ जाती 
जाने कैसे सारी अदाएं ही बदलती जा रही है 

पढ़ाई से थोड़ी कतराती, कभी जी चुराती 
Creativity में कमाल कर जाती 
कभी youtuber बन जाती 
कभी artist बन जलवा दिखती 
इस digital era में सबकी गुरु बन जाती 
नित नए शौक अपनाकर अपनी चंचलता से 
सबके दिलों पर राज करती जा रहीं हैं 
मेरी नन्ही सी परी , देखो कैसे बड़ी होती जा रही है 

दोस्तों की दोस्त, परिवार की जान 
यूँही हँसती खिलखिलाती रहे सदा 
जितनी अच्छी है दिल से 
वैसे ही आगे बढ़ती रहे यही है दिल से दुआ 
अपने हर जन्मदिन के साथ ही नए सपनों और नई उमंगों  को साकार करने जा रही है 
मेरी नन्ही सी परी देखो कैसे बड़ी होती जा रही है |

With lots of love 
   माँ 

 






Saturday, September 25, 2021

बेटी-बेटा !


बेटा - बेटी 

बेटी हो या बेटा  क्यूँ किसी को ज्यादा किसी को कम है आँकना 
दोनों की तुलना कर क्यूँ बसानी किसी के मन में हीन भावना 

दोनों की है अपनी स्वतंत्र पहचान 
अपने अपने सपनों की दोनों  ही भरते उड़ान 
अपने गुणों और क़ाबिलियत से दोनों पाते सम्मान 
दोनों परिवार की जान है और दोनों माता - पिता का है अभिमान

बेटियाँ घर की रौनक है तो बेटे  भी हैं घर की शान 
बेटियाँ गौरव बढ़ाती तो बेटे  भी बढ़ाते है सम्मान 
चंचल चुलबुल होती है बेटियाँ , बिखेरती पूरे घर में अपनी मुस्कान 
बेटों की मस्तियाँ और जिंदादिली जीवन बना देती आसान 
भावुक होकर भावनाओं में बहती है  अगर बेटियाँ 
बेटों में अपनी भावनाओं को छुपाने की कला और होता है व्यवहारिक ज्ञान 

बेटी हो या बेटा दोनों ही स्वस्थ समाज के  हैं आधार 
अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाकर पूरा करते अपना व्यवहार 
कोई नहीं भूलता अपना कर्तव्य और अपने संस्कार 
अपनी संस्कृति और जडों से दोनों को होता है उतना ही प्यार  

उनकी तुलना करके क्यूँ बसानी किसीके भी मन में हीन भावना 
बेटी हो या बेटा क्यूँ किसी को ज्यादा किसी को कम है आँकना

अलका डांगी 








Wednesday, September 15, 2021

चंद लम्हे फुर्सत के !

चंद लम्हे फुर्सत के. !!

एक अरसा हो गया फुर्सत के कुछ पल से रुबरु हुए 
तवज्जो नहीं दी जिसे करीब होते हुए 
जाने कहाँ खो गए वो पल हमसे रूठे हुए 
ढूँढ रही हूँ अब उसे , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

इस कदर अपनी दुनिया में हम मशगूल हुए 
कि बरसों बीत गए अपनी सुध लिए हुए 
फुर्सत के कुछ पल फिर याद आये , जब अपनों की महफ़िल में भी हम तन्हा हुए 
ढूँढ रही हूँ अब उसे , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

इस बार कोई बहाना नहीं , फुर्सत निकालनी है फुर्सत के कुछ पल जीने के लिए 
हर वो द्वार खोलने है जो बंद कर दिए थे अपने लिए
बेफिक्र हो जाना है फुर्सत को जीवन में अपनाते हुए 
कि फुर्सत का हाथ थाम लेना है बिना हिचकिचाते हुए 
सहेज लेना है अब उसे  , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

जरूरी है फुर्सत के कुछ पल भी ,सुचारु जीवन चलाने के लिए 
चंद लम्हें फुर्सत के चाहिए हँसने  , खेलने और अपनी रूचि अपनाने के लिए 
कि अपने लिए भी जीना है  ,जिम्मेदारी सारी निभाते हुए 
अब नजरअंदाज करके नहीं  , 
अंदाज बदल के  फुर्सत को गले लगाना है मुस्कुराते हुए |
सहेज लेना है अब उसे , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

अलका डांगी 








Tuesday, September 14, 2021

हिन्दी- हमारी पहचान!


हिन्दी  -हमारी  पहचान    !

राष्ट्र का सम्मान है हिन्दी 
हमारी पहचान है हिन्दी 
संस्कृति का अनमोल खजाना है 
भारत की आन - बान और शान है हिन्दी  !

स्वर और व्यंजन से जुड़कर निखर जाती 
हर शब्द की गरिमा और बढ़ाती 
कभी कठिन कभी सरल बन जाती 
आपसी सामंजस्य द्वारा सब में घुलमिल जाती हिन्दी 
इसकी सरलता पर हमें गुमान है 
भारत की आन-बान और शान है हिन्दी  !

प्रेम और आदर सत्कार की भाषा  है हिन्दी 
छोटे-बड़े हर संबंध को मधुर बनाकर 
दिलों में प्यार का दीप जलाती है हिन्दी 
भाषा का गौरव बरकरार रखती है हिन्दी 
आर्य संस्कृति का प्रतीक कहलाती है 
अजनबी का भी सत्कार करती है हिन्दी !

इसकी उन्नती के लिए तन-मन कुर्बान है
भारत की आन-बान और शान है हिन्दी  !




अलका डांगी 

Thursday, September 9, 2021

धर्म ..



धर्म है
तो विनय और विवेक है
धर्म है 
तो हर दिल नेक है
धर्म है 
तो शुद्ध विचार और आचार है 
धर्म है 
तो जीवन का उद्धार है 

धर्म मानवता है 
धर्म समभाव है
धर्म दया और करुणा है
धर्म मैत्री भाव है

धर्म में सुख-शांति का एहसास है 
धर्म में संतुष्टि का निवास है 
धर्म में मोह-माया  , छल - कपट नहीं 
धर्म में सच्चाई और सरलता का निवास है 
धर्म में आग्रह नही, धर्म अनेकांत है, 
धर्म की पहचान किसी जाति या मजहब से नहीं 
धर्म कर्तव्यनिष्ठ और शान्त है |


अलका डांगी 

Tuesday, September 7, 2021

डर !

ये डर भी बड़ा निडर है 
दिलो-दिमाग पर हावी होने की 
इसने छोडी न कहीं कोई कसर है 
कभी यूँ ही बेवजह, बेबाक चला आता है 
स्वस्थ तन-मन में बसा लेता अपना घर 
धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत बनाता है 
हावी हो जाता है अदृश्य शक्ति बनकर 
मुश्किल बना देता है जीवन भर का सफर !

कभी हार की तो कभी तकरार की वज़ह बन जाता है 
मंडराता रहता दुःख और चिंता का साया बनकर 
शातिर , चालाक और बड़ा मौकापरस्त होता है 
राज करने लगता है कमजोर और घायल मन पर !

उच्च मनोबल के सामने कभी टिक नहीं पाता 
कोशिश लाख कर के भी हो जाता बेअसर 
आत्मविश्वास और बेफिक्री को दे नहीं सकता टक्कर 
और एक दिन काफूर हो जाता है 
हिम्मत और हौसलों से भरी उड़ान देखकर !

डर तो दस्तक देता है जीवन के हर कदम पर 
सम्भल जाना पहले ही इसकी आहट सुनकर 
भरोसा रखना सदा खुद पर 
गिरकर   ,  थककर  , टूटकर भी 
हावी होने न देना डर को अपने ऊपर 
चलते रहना  , आगे बढ़ना अनवरत होके निडर 
डर से जीत गए तो ख़ुशनुमा होगा जीवन का हर सफर |



अलका डांगी 












Thursday, July 29, 2021

जिंदगी की नई शुरुआत

दौड़ती-भागती जिंदगी थोड़ी थम सी जरूर गई है 
पर कहीं जिंदगी की नई शुरुआत भी हुई है ।

कुदरत का करिश्मा , प्रकृति के नियम 
सब के अपने मह्त्व समझ आने लगे हैं 
दूर होकर गुमसुम हो गए थे जो,
वो रिश्ते फिर मुस्कराने लगे हैं 
कुछ गलत हुआ तो कुछ अच्छी बात भी हुई है 
कहीं जिन्दगी की नई शुरुआत भी हुई है ।

नेकी और दरियादिली बन्द दरवाजों की कैद से
खुलकर बाहर आने लगे हैं 
सो रहे थे जिनके ज़मीर, वो भी 
इन्सानियत और मानवता का परचम लहराने लगे हैं 
देर से ही सही आदमी को अपनी पहचान हुई है 
कहीं जिंदगी की नई शुरुआत भी हुई है ।

ये वक़्त का तकाज़ा है जिसमें उलझे हैं हम सभी 
समय के साथ समझदारी से फिर सुलझने लगे हैं 
संयम और आत्मविश्वास के साथ दिलों में 
आशा के अखण्ड दीपक फिर जलने लगे हैं 
साहस और मजबूत इरादों की सदा जीत हुई है 
कहीं जिंदगी की नई शुरुआत भी  हुई है ।

इस वक़्त ने इन्सान को कई नित नई राह भी दिखाई है 
जीवन जीने की कई अद्भुत कला भी सिखाई है
हाँ ! लड़खड़ा गई थी जो जिंदगी,
फिर नए जज़्बे के साथ खड़ी हुई है 
और जिन्दगी की नई शुरुआत हुई है ।


अलका डांगी 









Friday, July 9, 2021

आस्था और विश्वास !

आस्था और विश्वास. !!

प्रभु भक्ति और श्रद्धा है साथ 
मन में भी है अटल विश्वास 
वो सुन रहे हैं सभी की प्रार्थना औऱ पूरी होगी एक दिन भक्तों की अरदास 
चाहे प्रलय हो या हो विकट परिस्थितियों का आभास 
हारकर छोड़ेंगे नहीं कोई भी प्रयास ।

इश्वर के दूत सदा खड़े हमारे आस-पास 
नित नए रूप बदल कर बढ़ा रहें मदद का हाथ 
जहाँ नेकी,  सच्चाई और करुणा का वास 
अदृश्य सही , महसूस हो जाता है उनके होने का एहसास 

चिंता और गम ना शाश्वत है, न कोई संकट अविनाश 
सच्ची आस्था ही हमारी ताकत है और यही हमारा विश्वास 
जिस दिन प्रभु - नाम से  जुड़ जाएगी हमारी हर एक श्वास 
चित्त प्रसन्न हो जाएगा,  मिल जाएगा आत्मिक - सुख में रास  


अलका डांगी 

Sunday, July 4, 2021

सोच बदल कर तो देखो !!

सोच बदल कर तो देखो 
नजरिया बदल जाएगा 

अपनी हर बात सही की जिद्द पकड़ कर अड़े रहते हो 
नई सोच, नए बदलाव पर आपत्ति दिखाकर 
न खुद बदलते हो, न बदलने देते हो 
एक बार तोड़ कर तो देखो अपने सोच की जंजीरों को  मन कितना हल्का हो जाएगा 
सोच बदल कर तो देखो 
नजरिया बदल जाएगा 

हर बात अपने तराजू में तोलते हो 
सही-गलत के दायरे में रखते हो 
परंपरा के नाम पर बदलने से ड़रते हो 
एक बार दिल से अपनाकर तो देखो समाज के हर परिवर्तन को 
जीवन कितना आसान हो जाएगा 
सोच बदल कर तो देखो 
नजरिया बदल जाएगा 

नई सोच को जब मिलतीं है हौसलों की उड़ान 
अस्तित्व में आता है तब कोई नवनिर्माण 
दुनिया की कई मुश्किलों को मिल जाता है समाधान 
एक बार विस्तृत होने तो दो अपने सोच के सीमित दायरे को 
भविष्य उज्ज्वल बन मुस्कुरायेगा 

सोच बदल कर तो देखो 
नजरिया बदल जाएगा 

अलका डांगी 





Wednesday, June 30, 2021

एक सलाम डॉक्टर के नाम!


एक सलाम डॉक्टर के नाम !


ये डॉक्टर भी बड़े कमाल होते हैं
कोई इन्हें समझे या ना समझे 
हर मर्ज समझने में ये बड़े बेमिसाल होते हैं
इनका अनुभव और इनका इलाज - 
हर स्वस्थ जीवन की ये ढाल होते हैं |

अपने फर्ज और सेवा में रहते हर वक़्त मगन
मरीज़ की सलामती और संतुष्टि से दूर हो जाती इनकी थकन
कभी अस्पताल ही बन जाता है इनका आशियाना 
यहीं इनके तीज-त्यौहार होते हैं 
मुश्किल घड़ी में फरिश्ते बन कर 
जरूरतमंद के लिए मददगार होते हैं |

कोई भी बीमारी हो या हो कोई महामारी 
बिना थके, बिना रुके, दिन - रात करते रहते तिमारदारी
कर्तव्यनिष्ठा से सराबोर होते हैं 
ये कर्मवीर भी तारीफ और सम्मान के पूरे हकदार होते हैं  |

परिवार से बढ़कर अपने फर्ज को अंजाम देते हैं 
आज दिल से इनकी कुर्बानी को चलो मिलकर सलाम देते हैं |

अलका डांगी 



Saturday, June 19, 2021

पिता!!

पिता की छवि जैसे आसमान में जगमगाता रवि
अटल, अविचल,अपनी हर किरण से जीवन में भर देते रंग कई 
ऊर्जा के स्त्रोत , जीवन ज्योत , जिम्मेदारी से ओतप्रोत  
सुरक्षा कवच बनकर हिफाजत करते परिवार के हर सदस्य की 

वो हौसला बढ़ाते , मार्ग दर्शक बन जाते कभी 
सहारा है जीवन की हर मुश्किल घड़ी में भी 
बच्चों का भविष्य उज्ज्वल करने में दाँव पर रख देते अपनी जिंदगी 
परिवार और बच्चों की खुशी से ही जुड़ी है उनकी सारी खुशी 

वो सख्त नजर आते हैं पर असल में होते नहीं 
हर कार्य सुचारू रूप से चलता रहे 
इसलिए बंद दरवाजे में रखते हैं अपने दुःख दर्द और भावनाओं को भी 
उनके चेहरे की झुर्रियां बयान कर देती है जीवन की थकान सभी 

वो जीवन दाता भी है , हमारी प्रेरणा भी 
उनसे ही जुडी है हमारी रोम-रोम और अस्तित्व की हर कड़ी 
दुख-दर्द और पीड़ाएं सब कम हो जाती है उनके होने के एहसास भर से ही 
उनकी छत्रछाया सुरक्षित रखती जीवन में आए धूपछाँव कितने भी 
उनकी ख़ुशी और मुस्कान कायम रखना 
इससे बड़ा और कोई फर्ज और कर्तव्य नहीं 
कि ऋण नहीं चुका सकते चाहे न्यौछावर कर दे उनपर जीवन की सारी  धन-संपत्ति 


अलका डांगी 








दिल की बात

दिल ही दिल में बातें हजार करती हूँ 
लिखकर अपनी भावनाओं का इजहार करती हूँ 
कभी अपनी, कभी गैरों की भावनाओं में इस कदर बहती हूँ 
कि खुशी के नगमें और दर्द ए दिल शब्दों में बयां करती हूँ |

हर पीढ़ी के नजरिए को उनकी दृष्टि से देखने की कोशिश करती हूँ 
जीवन की वास्तविकता के प्रति अपनी समझ पेश करती हूँ 
कभी दिल की बात तो कभी हक़ीक़त दुनिया के सामने रखती हूँ 
शब्दों के तार छू जाए ऐसे दिलों में प्रवेश करती हूँ |

समाज की कुरीतियों और शोषण के खिलाफ 
आवाज उठाने की जुर्रत करती हूँ 
प्रत्यक्ष नहीं, अपने लेखन से सही 
कुछ सकारात्मक बदलाव की मंशा रखती हूँ |

ये प्रकृति की देन है, सरस्वती की कृपा है 
इसकी सदा इज़्ज़त करती हुँ 
कलम की ताकत अनंत है, अटूट है 
इसी विश्वास से लिख रही हूँ और लिखती रहती हूँ |

अलका डांगी 

Tuesday, June 15, 2021

इच्छाओं का जाल. !!

आदमी की इच्छाओं का ये हाल है
एक पूरी होते होते दूसरी बन जाती सवाल है 
खुश  है पर संतुष्ट नहीं, ये कैसा जंजाल है 
जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है 

कभी अपनी कभी अपनों की जरूरतों का रखता बहुत ख्याल है
बेख़बर फँसता चला जा रहा है, खुद नहीं पता कैसे बुन रहा  इच्छाओं का कोई जाल है
इच्छाओं की कोई सीमा नहीं ये तो अनगिनत, अनंतकाल है 
जरूरत  पूरी होकर भी इच्छाओं के आगे फिर कंगाल है 
जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है 

जीवन चक्र में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अकाल है 
इच्छाओं पर संयम स्व-नियंत्रण की मिसाल है 
आत्मनिरीक्षण एवं चिंतन से बदल सकता वो अपने जीवन के लय ताल है 
सर्वोच्च सुख कहीं नहीं, निज मन में बहाल है 
ये बोध ही अपने आप में कमाल है 
फिर जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है |

अलका डांगी 




Friday, June 11, 2021

पानी!

पानी की है अजीब दास्ताँ
मुफ्त में, सर्वत्र मिला तो किसीने कदर न जानी 
कटौती होने पर सबने भौंहे तानी
फिर भी करते रहे अपनी मनमानी 
इसके संरक्षण की किसीने न ठानी 

शहरों की सुख-सुविधाओं में ये बेहिसाब बह रहा है 
और मिलों दूर कहीं गाँव खेड़ा में कोई एक बूँद पानी को तरस रहा है
मॉल और ऊँची इमारतों में पानी बिक रहा है
और कोई मजबूर - बेबस परिवार नित्य दिन एक गागर पानी के लिए संघर्ष कर रहा है 

आधुनिक जीवन शैली और लापरवाही में पानी की कीमत हम भूल गए हैं 
तभी मुफ्त प्याऊ की जगह पानी के बाजार खुल गए हैं 
नदियाँ, तालाब सुख गए हैं, कुएँ गहरे नाम के रह गए हैं 
हैंड पम्प चलाते चलाते कंधे दुःख गए हैं 
धरती की गोदी खोदने में पानी के ठेकेदार जुट गए हैं 

अब भी समय है सम्भल जाना हे मानव! 
प्रकृति से खिलवाड़ नहीं उसकी रक्षा में ही हमारी प्रगति है 
जल जीवन है, ईश्वर की देन है, जिसकी मर्यादा में ही सभी की उन्नति है 
बढ़ते हुए प्रदूषण और हमारी बेपरवाही ने की उसकी दुर्गति है
कुदरत की इस अमूल्य धरोहर की रक्षा करना अब हमारी सबसे बड़ी चुनौती है |

अलका डांगी 







Tuesday, June 8, 2021

सावित्री बाई,!

सावित्री बाई की शादी छोटी सी उम्र में हो गई और ब्याह कर वह अपने छोटे से गाँव को छोड़ कर मुंबई शहर आ गई | खेत-खलिहान और गाँव की गलियों में स्वतंत्र घुमने वाली एक अल्हड लड़की शहर की संकरी गलियों के बीच एक छोटी सी खोली (झोंपडी) में जैसे कैद होकर रह गई | अपना बचपना भूलकर अचानक वयस्कों की जिम्मेदारी निभाने लगी |

वैवाहिक जीवन में भी खूब उतार-चढ़ाव आए | सासु इतनी तेज तर्रार थी कि पूरे घर का काम कराकर अंत में बचा-खुचा और झूठन ही देती थी | मार-पीट करना और दैनिक प्रताड़ना तो जैसे हर दिन की समान्य बात थी | बाई सबसे बड़ी थी इसलिए अपने चार देवर की देखभाल और बड़ा करने की जिम्मेदारी भी बहुत अच्छे से निभाई  | यह बात और है कि अब वे भी उसे नहीं पूछते और ना ही उसके त्याग और समर्पण की क़दर करते |
जब  उसके पति ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया तो औरों की क्या बात |   उसका पति भी दो तीन बच्चे पैदा कर दूसरी औरत के यहाँ रहने चला गया और जब कभी आता तो मारपीट और गाली-गलौच कर वापस चला जाता | अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ कर घर बैठ गया और थोड़े दिनों में शराब की लत ने उसका जीवन ही समाप्त कर दिया ||अब खाने पीने और बच्चों के पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई और फिर  सावित्री बाई ने घर घर जाकर बर्तन और झाड़ू पोछा का काम शुरू किया बच्चों का पालन-पोषण कर बड़ा किया |
छोटा बेटा पोलियो की वज़ह से अपंग था तो कुछ काम नहीं करता था और बड़ा बेटा होशियार था पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पर लग गया किन्तु शादी के बाद अपनी माँ से जिद्द कर पैसा लेकर दूसरा घर बसा कर वहाँ रहने चला गया और अपनी दुनिया में मस्त हो गया | किस्मत का खेल भी निराला है, बेटी की शादी बहुत अच्छे घर में हुई पर कुछ सालों में उसका पति भी दो  छोटे छोटे बच्चों को छोड़ चल बसा और अब वह भी अपनी माँ के साथ रहने लगी |
माँ बेटी दोनों दिन - रात मिलकर कमाते और घर चलाते
और बेटा अपंग का रोना रोकर उनके कमाई पर जीता फिर भी गाली गलौज करता और चैन से जीने भी नहीं देता 
बड़ा बेटा जरूरत पड़ने पर माँ के पास आता है और माँ की जरूरत पर फोन तक नहीं उठाता |
कोरोना काल में जब सम्पूर्ण बंद था और सभी के काम छूट गए तभी भी सावित्री बाई ने हिम्मत नहीं हारी |
अपनी बेटी के साथ मिलकर घर पर ही खाने की लजीज चीज़ें बनाकर बेचने लगी और जैसे तैसे घर का खर्चा निकालने लगी
जिस वक़्त अच्छे अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी काम बंद होने की शिकायत कर घर बैठ कर रोने लगे और परेशान होने लगे ऐसे वक़्त सावित्री बाई जो बिल्कुल अनपढ़ होते हुए भी कभी अपनी हिम्मत नहीं हारी और अपनी आमदनी का रास्ता स्वयम निकाला और खुद्दार भी इतनी कि कभी सेठ लोगों जिनके वहाँ काम करती थी उनके आगे हाथ तक नहीं फैलाया न ही अपने यहाँ किसी चीज की कमी का दुखड़ा रोया | बस पूरे दिन अपने काम में व्यस्त और मस्त रहती |और आज भी वही दैनिक क्रम है |सुबह शाम  घरों में काम करना और शाम से रात घर से लजीज खाना बनाकर अपना छोटा सा ग्रह उद्योग चलाना और फिर रात को चैन से सोना |

धन्य है सावित्री बाई के इस हिम्मत और जज्बे को जो सभी के लिए एक मिसाल है |जहां चाह वहाँ राह यह सावित्री बाई ने साबित कर दिखाया जो आज भी दिन रात एक कर ,  बिना थके बिना रुके पूरे दिन काम कर अपना घर और परिवार चलाती है | और सभी को जिन्दगी जीने का सलीका सिखाती है  |

अलका डांगी 

Thursday, June 3, 2021

झूठ की जिंदगी!

झूठ की जिंदगी जीते जीते 
आदमी अपनी असली पहचान खो रहा है
हर तरफ अपने अहं की संतुष्टि के लिए  
आडंबर और दिखावा हो रहा है 

हकीकत से वाकिफ़ है फिर भी 
जीवन से आँख मिचौली खेल रहा है 
झूठी शान, झूठी सान्त्वना, झूठी प्रशंसा 
खुश हो रहा है या अपने आप को धोखा दे रहा है 

समय के साथ भागते-भागते 
व्यर्थ चिंता और ग़मों का बोझ ढ़ो रहा है 
सब कुछ अपने भीतर है फिर भी 
बाहरी दुनिया में अपने अस्तित्व को खोज रहा है 

सच्चाई को स्वीकार कर अपनाएगा जिस दिन 
जागृत हो उठेगा वो आत्मबल और आत्मविश्वास जो सो रहा है 
झूठ के सहारे की जरूरत ही नहीं है उसे 
जो दिल ईश्वर की श्रद्धा और सच्चे धर्म में आत्मसात हो रहा है 

अलका डांगी 

Thursday, May 20, 2021

किरदार.!

कभी हालात को दोष देते हैं
कभी ज़ज्बात में बहते हैं 
अपनी कमियाँ नजरअंदाज करते हैं 
औरों का  बराबर हिसाब - किताब रखते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं.! 

कभी अकेलेपन और  तन्हाई की शिकायत करते हैं 
कभी संयुक्त और संगठन में रहकर भी एकान्त में जीते हैं
वक़्त की कदर न कर बेहिसाब बर्बाद करते हैं 
और समय की कमी की बात करते हैं
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं.! 

मन - मुताबिक हो तो मुस्कराते रहते हैं
नहीं तो ग़म और उदासी के साये में जीते हैं 
जीवन - दर्शन और ज्ञान बाँटते फिरते हैं 
अपना जीवन चिंता और अपूर्ण के एहसास में व्यतित करते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं ! 

ये अंदर कुछ बाहर कुछ होते हैं 
जीवन - भर चेहरों पर अनगिनत मुखौटे पहनते हैं 
कभी खुद भी इन सब से अनजान होते हैं 
कभी जान बुझ कर सब के लिए ज़िम्मेदार होते हैं 
ये हम हैं और हमारे इर्द-गिर्द भी ऐसे कई प्रकार होते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं ! 

अलका डांगी 

Thursday, May 6, 2021

अंधेरे में रोशनी !!




है ये जिन्दगी का इम्तिहान
हर हाल में जीत कर दिखायेंगे
माना कि ये जंग नहीं आसान फिर भी 
सब्र और संयम की ढाल अपनाकर 
हर हालात पर काबु पाएँगे 

एक - दूसरे का रखते हुए ध्यान 
मदद के हाथ भी आगे बढ़ायेंगे 
एकता की देते हुए पहचान 
अपने - पराये, हर रिश्तों को और भी मजबुत बनाएँगे 

नतीजों से हो भले सब अनजान 
अपने प्रयत्नों में कमी नहीं लाएँगे 
किसी के जीवन में भरेंगे मुस्कान 
किसी की चिंता और मायूसी दूर भगाएंगे 

अग्रणी कार्यकर्ताओं को देते हुए सम्मान 
हौसले उनके और बढ़ाएंगे 
दूर हो जाएगी जीवन की ये थकान 
अगर किसी का जीवन हम उज्जवल कर पाएँगे


ईश्वर का है अगर ये फरमान 
अंधेरे में रोशनी भी वो ही दिखाएंगे 
हर दिल का पूरा होगा अरमान
नई आस के साथ फिर चैन और सुकून की जिंदगी बिताएंगे

अलका डांगी

Monday, May 3, 2021

बदलना जरूरी है.!!

समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

देश और समाज की उन्नति के लिए 
हर राह पर अनवरत प्रगति के लिए 
नई तकनीक नई सोच में ढलना जरूरी है 
समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

हर एक पीढ़ी के नजरियों को तवज्जो देने के लिए
किसी के ज़ज्बात और हालात के पीछे की वज़ह समझने के लिए
रिश्तों की गरिमा और नजाकत बरकरार रखने के लिए 
उम्र के हर मोड़ पर साथ चलना जरूरी है
समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

अपनी मेहनत और मशक्कत से हासिल सफलता कायम रखने के लिए 
मुश्किल घड़ी में संभलने और आगे बढ़ने के लिए 
कभी अपने तो कभी अपनों का भविष्य उज्ज्वल करने के लिए 
त्याग और समर्पण भी जरूरी है 
समय के साथ बदलना जरूरी है ! 

मानव जन्म को सफल और सार्थक बनाने के लिए 
जरूरत मन्द को मदद का हाथ बढ़ाने और सहारा बनने के लिए 
दूसरों के जीवन में खुशियाँ और बहार भरने के लिए 
करुणा-वात्सल्य से भरा सरल मन होना जरूरी है
समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

अलका डांगी 





Wednesday, March 31, 2021

इन्सानियत ही व्यक्ति की पहचान!!

धरती पर जब जन्म लेता है इंसान
इन्सानियत ही होती है व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान

तुम रंग - रूप और कद - काठी निहारते हो
गोरे - काले, ऊँचे - नीचे, मोटे - पतले का भेद जता
हीन भावना का एहसास दिलाते हो
जो ईश्वर की देन है उसकी हँसी उड़ाते हो
एक अच्छे - भले, सीधे - सरल इंसान का आत्मविश्वास डगमगाते हो
आखिर क्यूँ नहीं दे सकते हम सभी को एक जैसा सम्मान 
इन्सानियत ही तो होती है व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान 

किसी के सपनों की उड़ान भरने से पहले ही उसके पर काट, 
अपने अहं की संतुष्टि और अभिमान का झंडा लहराते हो 
किसी की मंजिल की राह में रूकावट डाल अपनी कामयाबी का जश्न मनाते हो 
राजनीति के दाँव पेंच खेल अपनी हुकूमत चलाने की खातिर 
किसी को नीचा दिखा उसका अस्तित्व मिटाते हो 
धर्म, रूढी और परंपरा के नाम से दंगा - फसाद फैला 
इंसान को इंसान से लड़वाकर आतंक बढ़ाते हो 
आखिर क्यूँ नहीं हम मुसीबत और जरूरत में 
इक - दूजे का सहारा बन अडिग रहें मील के पत्थर के समान 
इन्सानियत ही तो होती है व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान 
 
क्यूँ रहते हैं हम जानकर भी अपने ज़मीर से अनजान.!! 
कब तक देना पड़ेगा हर मोड़ पर इन्सानियत का इम्तिहान!! 
कब तक देते रहेंगे मासूम और निर्दोष अपनी जान!! 
क्या इन्सानियत से बढ़कर है किसी की आन-बान-शान 
कब समझेंगें कि इन्सानियत ही है व्यक्ति की असली पहचान!! 

अलका डांगी 


Monday, March 22, 2021

परिवार

आपसी समन्वय परिवार की शान है
छोटे - बड़े, जहाँ करते सभी इक - दूजे का सम्मान है
बड़ों का बड़प्पन, छोटों का मस्त-मौलापन 
हर दिल के अरमान रखता जवान है
सलाह - मशवरा और परामर्श से
मिल जाता हर मुश्किल का समाधान है 
सुख - दुख में साथ खड़े होकर 
मिट जाती जीवन की थकान है 
बुजुर्गों का तजुर्बा, जवाँ दिलों का नजरिया 
मिलकर बना देते हर कार्य आसान है 
आपसी टकराव हो या हो मनमुटाव 
फिर भी सदा रखते एक - दूसरे का ध्यान है 
इसके जैसा जीवन में है नहीं कोई बन्धन 
परिवार से जुड़कर ही बनती सबकी पहचान है |

अलका डांगी 


Sunday, March 21, 2021

कविता

हर कवि की रूह होती है कविता
मन की भावना और कल्पना की छवि होती है कविता
कुछ कहे कुछ अनकहे शब्दों में जान भरती है
और दिल के झरोखों से उड़ान भरती है कविता
कभी प्रेमिका तो कभी बागी बनती है 
अपने तजुर्बे से महान बनती है कविता 
कोई प्यार से अपनाए चाहे कोई ठुकराए
दिलों में फिर भी जवान रहती है कविता 
चाहे भक्ति कहो चाहे कहो इसे शक्ति
अंतर्मन में नित्य चलने वाली कश्ती है कविता
जीवन का सार है, कभी तकरार है, मन की पुकार है, 
हर वक़्त हृदय में जिसके बहती है कविता 

अलका डांगी 

 




Thursday, March 11, 2021

विचार!!




विचारों का क्या है ये तो आते जाते रहते हैं 
कभी अच्छे कभी बुरे, जहन में हलचल मचाते रहते हैं 
सृजनात्मक हो तो अपने साथ सारी सृष्टि का हो जाता है उद्धार 
विनाशक बन जाए तो हो जाता है नष्ट - भ्रष्ट समस्त संसार.! 

इनकी मर्यादा में  ही है सुखी जीवन का सार
कुछ हमारे विचार , कुछ तुम्हारे विचार 
व्यक्त करो, कर लो साझा या लो जीवन में उतार 
इनको सहजो, या लो फिर इन्हें सँवार 
पर जबरन किसी पर थोपते फिरो अपने विचार 
नहीं देता है कोई, किसी को भी ये अधिकार ! 

विचारों में भी शक्ति होती है अपार 
सकारात्मक हो तो जीवन हो जाता साकार 
नकारत्मक कर देता जीना ही दुश्वार 
सोच समझ कर सींचना इन्हें हर बार 
आखिर अपने विचारों की नैया के हम ही तो हैं खैवनहार.!

अलका डांगी 

Friday, March 5, 2021

बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !!

ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया.!! 

जवानी में इसकी बात न मानी 
जिम्मेदारी और भागदौड़ में अपने 
शरीर की कदर न जानी
और समय हाथ से निकल गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया.!! 

इसने तो अपने लिए जीने का समय दिया 
ढलती शाम की रंगीनियत का परिचय दिया 
अपने अधूरे ख्वाब और शौक फिर से अपनाने का ज़ज्बा दिया 
पूरा जीवन तजुर्बे से भर गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया  !! 

योग, प्राणायाम, और ध्यान  लगाकर 
श्वाछोश्वाश की तरफ ध्यान केंद्रित किया 
धर्म, अध्यात्म और समाज सेवा से जुड़कर 
जीवन का मर्म समझ लिया 
समय का खालीपन भरता गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !! 

बच्चों और परिवार के साथ बेफ़िक्र हो 
हर सम्बंध और गहरा किया 
दोस्तों के साथ गपशप और ठहाके लगाकर 
अपने आयुष्य को लंबा किया 
नया ज़माना, नई पीढ़ी, नई सोच के साथ 
जीवन में नए अनुभव भरता गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !! 

हर जीवन का ये अभिन्न अंग है 
आज हमारे तो कल किसीके संग है 
तन पर हमारा बस नहीं तो क्या 
गर हर मन में जीने की उमंग है 
फ़िर जिंदादिल और प्रफुल्लित
 जीवन का हर क्षण हो गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !! 


अलका डांगी 



Thursday, March 4, 2021

कर्म वाद

भवों भव के फेरे लगवाता है 
इसे हर कोई समझ नहीं पाता है 
नए पुराने बंधनों में बंधता जाता है
कर्मों से जुड़ा ऐसा नाता है 
ये आत्मा ही हमारा विधाता है l

ज्ञान दर्शन मोहनीय - घाती कर्म कहलाए
वेदननीय नाम गोत्र आयुष्य जिसने सरल बनाए
अरिहंत की शरण वो पा जाता है 
मोक्ष के द्वार की तरफ कदम बढ़ाता है 
ये आत्मा ही हमारा विधाता है 

राग-द्वेष से जो जुड़ता जाता है 
क्रोध, मान , माया , लोभ 
इन कषाय के भँवर में फंसता चला जाता है 
जन्मों जन्म तक सहन कर्ता जाता है 
ये आत्मा ही हमारा विधाता है 

आठों कर्मों के बंधन से जो मुक्त हो जाता है 
 जीवन मरण के चक्र से छूटकर सिद्ध गति पा जाता है 
कर्म के मर्म को जो समझ जाता है 
वही मुक्ति द्वार खोल पाता है 
ये आत्मा ही हमारा  विधाता है 

अलका डांगी 


जीवन की संध्या!!

शर्माजी बहुत ही सीधे सरल, आदर्शों पर चलने वाले नीति वादी व्यक्ति थे। एक छोटे से गाँव से बाहर निकलकर अपनी मेहनत और लगन से खूब पढ़ लिख कर अपने बल बूते एक आदर्श शिक्षक बने और परिवार का गौरव बढ़ाया l पूरी जिंदगी में उन्होंने अपने उसूलों और अनुशासन से एक अलग मकाम हासिल किया l

अपने शिक्षण काल में अपने विद्यालय और अपने कार्यक्षेत्र की दिलों जान से  निःस्वार्थ भाव से सेवा की और उनकी प्रगति में पूरा योगदान दिया l उनकी ईमानदारी और शिक्षा के प्रति उनके इस योगदान के लिए उन्हें सरकार की तरफ से सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ l घर परिवार और दोस्तों के लिए भी सदा खुशी खुशी हर वक़्त सबकी मदद के लिये तैयार रहते थे और  सभी में खूब इज्ज़त कमाई l परन्तु इस दरमियान कभी भी उन्होंने कोई शौक पूरा नहीं किया न ही घर परिवार और अपने कार्य (शिक्षण) के अलावा कुछ और सोचा भी l धीरे धीरे जब वे रिटायर्मेंट की कगार पर पहुंचे तो अपने आपको खाली महसूस करने लगे l अब उन्हें अपनी चिंता और अपने परिवार की चिंता सताने लगी l ऐसा नहीं था कि वे पैसे से समृद्ध नहीं थे, उनके पास पूर्वजो की जमीन जायदाद और अपनी जिंदगी भर की मेहनत का अपार धन भी था जिससे वे अपनी पूरी जिंदगी खुशी से बैठ कर निकाल सकते थे l पर  अत्यधिक सोच और चिंता के कारण उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वे धीरे-धीरे हर काम के लिए दूसरों पर आश्रित होते गए और अपना आत्मविश्वास और मनोबल खोने लगे | ऊपर से स्वस्थ दिखते पर आत्मा सदा परेशान रहने लगी |
जब आदमी अपने फैसले खुद न लेकर दूसरों पर आश्रित होता जाता है तब वह धीरे-धीरे अपने आपको पंगु बना रहा होता है l पूरी जिंदगी मेहनत और लगन से हासिल किया हुआ पैसा अब उन्हें अखरने लगा l अपनी नकारत्मक सोच और बुढ़ापे की चिंता धीरे-धीरे जहर बनकर उनके शरीर में फैल गई और अलग अलग बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया l अब वे चाहकर भी अपने आप को इस भँवर से बाहर नहीं निकाल पा रहे थे अपनी जिंदगी का हर क्षण चिंता में गुजारने लगे |

ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति की हालत बुढ़ापे में ऐसी ही होती है!!

बहुत से बुजुर्ग अपनी शेष जिंदगी अपने पुराने शौक पूरा करने या फिर नया शौक पालकर उसमें खुश रहते हैं l कोई समाजसेवा तो कोई धर्म ध्यान और अध्यात्म में अपने आपको समर्पित कर देते हैं और जीवन को जैसा है उसे अपनाकर जीवन सफ़ल करने की कोशिश करते हैं l
इसमें भी अलग अलग पहलू होते हैं, किसी आदमी के पास बुढ़ापे में अपना जीवन व्यतित करने जितना धन होता है और शरीर से भी स्वस्थ रहता है और परिवार वालों का प्रेम और सहयोग होता है तो वह अपनी मर्जी से जीता है और दूसरों पर शारीरिक और आर्थिक रूप से आश्रित नहीं होता इसलिए खुश भी रहता है l कोई आदमी बुढ़ापे में इतना सक्षम नहीं होता पैसे और शरीर से परंतु फिर भी सबका प्रेम और सहयोग प्राप्त हो तो परिवार वालों के हिसाब से ढल जाता है और उसी मे संतुष्ट हो जाता है l कोई इंसान आर्थिक और शारीरिक रूप से भी थोड़ा कमजोर होता है और परिवार में भी आपसी क्लेश एवं कलह तथा मनमुटाव चलता है तो उसे दिन रात तानों का सामना करना पड़ता है और मन मारकर चुपचाप सब कुछ सहन करते हुए जीवन का यह पड़ाव जैसे-तैसे गुजारना पड़ता है | और कोई शर्माजी की तरह होते हैं जो सब कुछ होते हुए भी अपनी जिंदगी डर और चिंता में व्यतित करते हैं और सदा दूसरों को खुश रखने और किसीका दिल नहीं दुखे इस सोच में अपने आपको दुखी करते रहते हैं l उनके अंदर एक अनजाना भय रहता है कि अब आखिरी वक़्त में उनका और उनकी पत्नी का क्या होगा, कौन बुढ़ापे में उनकी सेवा करेगा? वे किसी पर आश्रित होना भी नहीं चाहते परन्तु उन्हें ये भी नहीं पता पडता है कि वो  अनजाने में इतना ज्यादा आश्रित हो चुके होते हैं कि अब वे चाहकर भी अपना निर्णय नहीं ले पाते और अपनों की इजाजत के बिना कुछ भी करने में अपने आप को सक्षम नहीं समझते हैं और एक लाचार जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं 
-कहीँ कहीं अपनी इस हालत का जिम्मेदार किसी हद्द तक इंसान खुद भी होता है क्योंकि व्यर्थ की चिंता करते-करते बुढ़ापे तक पहुँचते पहुँचते अपने आज और भविष्य दोनों का कंट्रोल अनजाने में किसी और के हाथों में खुद ही देते है और अपनी शेष जिन्दगी दुखी होकर व्यतित करने के लिए मजबूर हो जाते है l 

ऐसे वक़्त में परिवार वालों का प्यार और सहयोग ही उन्हें हिम्मत और खुशियाँ दे सकता है बशर्ते परिवार के सदस्य उनकी इस हालत और परिवर्तन को समझे स्वीकार करें और उन्हें इस परिस्थिति से बाहर निकालने का प्रयत्न करें | कहते है बच्चे और बुजुर्ग दोनों को संभालना लगभग समान होता है |दोनों को ही प्यार विश्वास और सुरक्षा का सहारा चाहिए होता है तभी वे खुश और निश्चिन्त होकर जीते हैं |और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है 

यह बहुत ही दुखदायी परंतु सच्ची हकीकत है जिसे हर कोई समझ नहीं सकता और शायद स्वीकार भी नहीं कर सकता कि कैसे एक व्यक्ति जिसने अपने जीवन की सुबह बहुत ही हंसते- खेलते आराम से गुजारी वो जीवन की संध्या में पहुँचते पहुँचते दुःख दर्द  और मानसिक पीड़ा  और  परिवार की तकलीफ़ों से परेशान होकर इस जीवन को  चुपचाप अलविदा कर के  एक दिन अचानक चले जाते हैं |

अलका डांगी 

Friday, January 29, 2021

अपने फैसले. !

अपने फैसले स्वयं लोगे
तभी दूसरों पर निर्भर कम रहोगे 
जब अपने आप को समझोगे
तो जीवन में तरक्की भी करोगे 

सलाह - मशवरा ले भी लोगे 
फिर भी अंतिम निर्णय तो स्वत: करोगे 
खुद पर विश्वास रखोगे 
तो सही दिशा भी चुन लोगे 

गलती करोगे तो स्वीकार करने का हौसला भी रखोगे 
दूसरों को दोष देकर अपनी कमियों को तो नहीं ढंकोगे
हारोगे - जीतोगे, जब गिरोगे तब उठना भी सीख लोगे 
फिर से एक नयी शुरुवात तो करोगे 

मुश्किल घड़ी में किसी के आसरे तो नहीं रहोगे 
तब ही अपने किए फैसलों पर सदा नाज़ करोगे 
अपने जीवन में हर पल  संतुष्ट रहोगे 
तब ही दूसरों के जीवन में भी खुशियों के रंग भर सकोगे! 

अलका डांगी 





Sunday, January 10, 2021

मानसिक स्वास्थ्य - समय की जरूरत

' अवसाद ' (depression) और  'चिंता और घबराहट और तनाव' (anxiety) ये शब्द शायद आज भी कई लोगों के लिए अनजाने होंगें और हो सकता है कई इससे वाकिफ भी हो सकते हैं, शायद कभी किसी अखबार में पढ़ा हो या किसी के मुँह से सुना हो या किसी अपने को इस परिस्थिति से गुजरते देखा हो 
पर बहुत कम लोग ही ये जानते और मानते होंगे कि यह सब एक मानसिक बीमारी का प्रकार है |
जो व्यक्ती इस बीमारी का शिकार होता है वह बाहर से एक स्वस्थ और साधारण इंसान की तरह ही लगता है, परन्तु उसके आंतरिक मन और मस्तिष्क में एक अजीब सी घबराहट और खलबली चल रही होती है जिसे वह महसूस तो करता है पर किसी अन्य को समझा और बता नहीं सकता |इसे सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक ही समझ सकता है या फिर वह व्यक्ति जो इस दौर से गुजर चुका है वही इसे बेहतर समझ सकते हैं | 

हमारे भारतीय समाज और परिवार में इसका जिक्र करना भी एक बहुत ही गंभीर परिस्थिति उतपन्न कर देता है, अव्वल तो वे इसे बीमारी मानकर इसका इलाज कराने से कतराते हैं और जो व्यक्ति इस दौर से गुजर रहा है उसे और उसके स्वभाव को दोषी करार कर उसे अपने आप को बदलने के लिए सलाह मशवरा देने लगते हैं और कभी कभी तो लोगों के डर और समाज की शर्म उन्हें इसे स्वीकार करने से रोकती है  |जब कि इससे पीड़ित इन्सान स्वयं नहीं समझ पाता कि उसके साथ ऐसा क्यों और क्या हो रहा है, कभी-कभी तो उनके मन की चिंता, घबराहट और कशमकश इस हद्द तक बढ़ जाती है कि उसे अपना जीना भी निरर्थक लगने लगता है और अपनों को परेशान करने की अपेक्षा उसे अपना जीवन का अन्त करना बेहतर लगता है | इस आत्मग्लानि और कुंठाग्रस्त विचारों से वह असहाय और मजबूर होकर कुछ भी गलत कदम उठा सकता है |


समय आ गया है कि हम इन मानसिक बीमारियों को अपने पूर्वाग्रह और मापदंड में तोलने की अपेक्षा उन्हें समझने का प्रयत्न करें तथा उसे स्वीकार कर जल्द से जल्द उसका निवारण करें | आज जब पूरी दुनिया में छोटे बच्चों, जवानों और बुजुर्गों तक हर कोई इसका शिकार हो रहा है ऐसे वक़्त हम उन्हें अपना प्यार और हौसला देकर, इसका सही समय पर उचित इलाज करवा कर उन्हें इस भँवर से बाहर निकालने में उनकी मदद करें और उनकी जिंदगी  फिर से खुशियों से भर दें |

 अलका डांगी 
 







Wednesday, January 6, 2021

प्रेम!

प्रेम 

प्रेम पूजा है,  प्रेम ही भक्ति है
प्रेम बलिदान है, और प्रेम ही शक्ति है 

 प्रेम मन का सुख है, प्रेम ही मन का चैन
प्रेम किसी का मोहताज नहीं, प्रेम तो है ईश्वर की देन 

प्रेम प्रेरणा है, प्रेम ही समर्पण 
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं, प्रेम है नित्य नव - सृजन 

प्रेम का कोई रूप नहीं, प्रेम मन का मीत है 
प्रेम हर दिल में बसता है, प्रेम ही जीवन संगीत है

प्रेम बाँटने से बढ़ता है, प्रेम जीने का सहारा है
प्रेम अपने दिल में बसा दो , फिर हर दिल पर राज तुम्हारा है!! 



 अलका डांगी