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Tuesday, February 20, 2024

सुखी और आदर्श परिवार. ??

सुखी और आदर्श परिवार  ??


कहते हैं परिवार तभी सुखी कहलाता है जब सब साथ मिलजुल कर रहते हैं और यह भी कहते हैं कि परिवार में आपसी नोक-झोंक और छोटे-मोटे झगड़े और मतभेद चलते रहते हैं इससे रिश्ते और मजबूत बनते हैं और किसी हद तक हम सब इस बात से सहमत भी हैं परंतु इसी बात का एक दूसरा पहलू भी है जब आदमी परिवार में रहकर भी अपना सुख चैन अपनी नींद और कार्य प्रभावित होता हुआ देखता है और दिन-रात दुखी और चिड़चिड़ा रहता है या गुमसुम और खोया रहता तब हमें इसका निवारण करने के लिए दूसरा पहलू भी जानना जरूरी हो जाता है |
लोगों का मानना है कि परिवार में सब अपने ही तो होते हैं तो भला कोई किसी का बुरा कैसे चाह सकता है या किसी का शोषण क्यों करेगा परंतु यह एक ऐसा कड़वा सच है जिसे समझने के लिए कोई तैयार बिरला ही होता है शोषण की शुरुआत कभी-कभी घर से भी होती है जिसे खुद परिवार वाले भी नहीं समझ पाते क्यूँ कि ये अनजाने भी हो सकता है या जानकर भी जिसे स्वीकार करना भी सबके लिए किसी चुनौती से  कम नहीं है  | कभी-कभी माता-पिता बच्चों और घरवालों के शोषण का शिकार होते हैं तो कभी-कभी बच्चे भी माता-पिता  और परिवार के अन्य सदस्यों के शोषण का शिकार हो सकते हैं | यह समाज की ऐसी कुरीति है जो देखकर भी सभी अनदेखा करते हैं और चुपचाप सहन करते चले जाते हैं |
एक सुखी परिवार आदर्श मिसाल हो सकता है और ऐसे बहुत परिवार भी होते हैं जो हमें प्रभावित करते हैं परंतु सभी परिवार आदर्श की मिसाल नहीं हो सकते और इस बात को भी स्वीकार  करना चाहिए | ऐसे भी परिवार होते हैं जहाँ पति  - पत्नी में या माता-पिता भाई-बहन या भाई-भाई और बेटों बेटियों में आपसी कलह होते रहते हैं  यहाँ तक कि मार पीट और मानसिक शोषण भी होते हैं पर फिर भी साथ रहते हैं जिसकी वज़ह बहुत  हद  तक सामाजिक और आर्थिक   ही हो सकती है | 
बहुत  से परिवार संयुक्त जब रहते हैं और  नए रिश्ते और संबंध जुड़ते हैं तब  भी घर के  मौजूदा सदस्यों तथा नए सदस्यों का आपस में व्यवहार और आचरण ही परिवार की खुशी का मापदंड तय करता है | जब एक दूसरे को दिल से अपना नहीं सकते और राजनीति कूटनीति और नियमित कलह होते हैं तब परिवार के संवेदनशील और भावुक व्यक्ती सबसे ज्यादा सहन करते हैं और पीड़ित होते हैं और इसका शिकार होते हैं | और इसी वज़ह से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है | फिर भी हमारा भारतीय समाज तथाकथित संस्कारों का वास्ता देता है और परिवार वाले भी अपने से ज्यादा समाज और लोगों के भय से सब कुछ चुपचाप सहन करते हुए अच्छे परिवार का चित्र या परिकल्पना करते है जो कि एक स्वस्थ समाज और परिवार के सदस्यों के लिए पूरी तरह से नुकसान देह है |
समय रहते परिवार वाले स्वयं अपने निजी फैसले बिना किसी सामाजिक दबाव के सबके हित के लिए कर सर्वसम्मति और समझदारी दिखाएँ यही बडप्पन होता है चाहे किन्हीं वजहों से परिवार से अलग करना या रहना पड़े  परंतु रोज-रोज के कलह क्लेश और मानसिक प्रताड़ना से बच सके और अपना जीवन स्वाभिमान और शांति से गुज़ार सके इसमें ही सबका हित निहित है सिर्फ लोगों को दिखाने के लिए आदर्श परिवार का वास्ता देकर जबरन साथ रहना और सहनशक्ति को दाँव पर रखना कहाँ की समझदारी है. ?
दूर रहकर  भी खुशी से परिवार के सुख-दुःख में साथ खड़ा रहना  , जरूरत पड़ने पर बिना कहे , समझ कर एक दूसरे की मदद करना क्या आदर्श मिसाल नहीं है क्या दूर रहने से परिवार वालों का प्रेम कम हो जाता है या वो एक परिवार नहीं कहलाता  ?  रोज - रोज परिवार की राजनीति और क्लेश कलह से अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तथा सुख शांति के साथ समझौता करने से बेहतर है दूर रहकर भी परिवार वालों के बीच प्रेम और अपनापन बना रहे और सभी चैन और सुकून की जिंदगी जी सकें |


अलका डांगी 

Thursday, February 15, 2024

जरूरी है !!

आत्मविश्वास जरूरी है 
कार्य सिद्ध करने के लिए 
आंधी तूफान से उबरने के लिए 
आशा और विश्वास की नींव मजबूत करने के लिए

बदलाव जरूरी है 
समाज और परिवार के हित के लिए 
प्रगति और उन्नति के लिए
शांत चित्त और समकित के  लिए 

चलते रहना जरूरी है 
स्वस्थ और निरोगी शरीर के लिए 
स्वावलंबी जीवन के सफर के लिए 
तय मंजिल हासिल करने की डगर के लिए 

शौक होना जरूरी है 
अपना कौशल सँवारने के लिए 
हर पहलू का दृष्टिकोण अपनाने के लिए 
आस्था और मनोबल बढ़ाने के लिए 

दोस्तों और परिवार का साथ जरूरी है 
प्रेम और अपनेपन की ताकत समझने के लिए 
हर हालात से निपटने के लिए 
गिर कर फिर संभलने के लिए 

मुस्कुराना जरूरी है 
सकारात्मक आभामंडल के लिए 
मुश्किल परिस्थितियों में संबल के लिए
प्रसन्नचित्त और प्रफुल्लित अंतर्मन के लिए 


अलका डांगी 
 






Thursday, February 8, 2024

मेरा गाँव

मेरा गाँव आज भी उतना ही हसीन दिखता है 
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है 

खेत-खलिहान की हरियाली से 
सुबह की लाली और ढलती शाम मतवाली से 
शुद्ध हवा में साँस लेता है 
मेरा गाँव आज भी बेपरवाह होकर जीवन जीता है 
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है 

चरवाहों के संग चलते भेड़ बकरियों की कतारों से 
पशु पक्षियों की मधुर पुकारों से 
नीम और पीपल के छांव के किनारों से 
पर्वतों और पहाडियों के बीच आशियाना सजता है 
मेरा गाँव आज भी खुले आसमान में अंगड़ाई लेता है 
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है 

सिर पर छलकता हुआ पानी का घड़ा लेकर चलती मस्त चालों से 
नुक्कड़ पर  लगते गरमागरम चाय के ठेलों से 
सड़कों पर बेफिक्र खेलते बच्चों और बुजुर्गों के आपसी मेलों से 
अपनेपन और सादगी के साथ सरलता से 
मेरा गाँव आज भी इन्सानियत और जिन्दादिली की मिसाल कायम करता है 
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है 

नदी में बहते चंचल पानी के बहाव से 
तालाब के पानी के ठहराव से 
सादी साग रोटी  के हर निवाले में गाँव की मिट्टी के स्वाद से
हर आत्मा संतृप्त करता है 
मेरा गाँव आज भी मंद गति से चलकर भी खुश रहता है 
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है 

अलका डांगी