पर वो कहाँ अब तक हमारे दिल को समझते
माना कि वो बड़े दिल वाले हैं पर रिश्ते तो हमने भी बखूबी संभाले हैं
वो रिश्ते निभाने के लिए अपनों को दाँव पर रखते हैं
हम अपनों और रिश्तों की मर्यादा के भँवर में फंसते हैं
उनका तरीका अलग है, हमे मंजूर है
पर हम भी कभी अपने तरीके से जी लेते हैं तो इसमें हमारा क्या कसूर है.?
उन्होंने अपने रिश्तों - नातों को निभाकर खूब नाम कमाया
पर हमने जब भी चाहा सदा उन्हें दूर पाया
वो हर वक़्त गलत है ऐसा भी हम नहीं कहते
न उनसे बड़ा बनने की चाहत ही रखते
पर रिश्ते - नाते निभाते निभाते
काश हमारे रिश्ते की गरिमा वो भी कभी समझते
अलका डांगी