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Wednesday, December 18, 2024

चुल्हा !

चूल्हा 

रसोई घर की रंगत है 
अग्नि की संगत है 
जलकर सब की भूख शांत करता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

कभी धीमी तो कभी तेज गति 
जरूरत अनुसार लय-ताल बदलता है 
अन्न के हर निवाले में स्वाद भरता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

वार- त्यौहार , प्रसंग अनुसार सदाबहार मचलता है 
अपनों के गम में शोक व्यक्त कर बुझता है 
फिर दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

अमीर गरीब हर घर 
गांव  - शहर ,  प्रकृति वही,  पर रूप बदलकर 
सबको चैन से सुला कर ठंडी आह भरता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है

अलका डांगी 

Sunday, December 1, 2024

सीख !


कुछ सीख लेते हैं संसार से 
कि सर्वोच्च शक्ति के आगे सभी को झुकना है 
कुदरत के नियम और सृष्टि की संरचना में ढलना है
समय के साथ गतिशील रहना है 
संयम और संतोष के साथ सदा जीना है 
सामाजिक और व्यवहारिक आचरण में संतुलन बनाकर रखना है 

कुछ सीख लेते हैं जीवन से 
कि सदाचार का आचरण करना है 
विपरीत परिस्थितियों में भी साहस का परिचय देना है 
ना शोषण करना है ना शोषित होना है 
मुस्कराते हुए कर्तव्य पथ से गुजरना है 

कुछ सीख लेते हैं अंतर्दृष्टि से भी 
कि गम हो या खुशी समता में रहना सीखना है 
अपनों - बेगानों का दर्द  एक समान समझना है 
तर्क-वितर्क से नहीं दृष्टिकोण बदलकर निरंतर आगे बढ़ना है
जिन्दादिली और प्रेम से हर पल  को बेह्तरीन करना है 

कुछ सीख लेते हैं किताबों से 
कि दुनिया में ज्ञान का अनंत भंडार है 
हर क्षेत्र में प्रगति के जिससे खुल जाते सारे द्वार है  
ज्ञान ही मददगार है , ज्ञान ही तारणहार है 
जीवन का सबसे श्रेष्ठ उपहार है

कुछ सीख लेते हैं धर्म और अध्यात्म से भी 
विनय विनम्रता और सरलता से जुड़ा हर ज्ञान अभंग है 
धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान कराता आत्मा-परमात्मा का संग है 
आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन ही जीवन का महत्वपूर्ण अंग है 
निर्वाण पाना ही हर मन की आखिरी तरंग है |

अलका डांगी