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Saturday, December 28, 2019

राजनीति!!

राजनीति भी कैसी कमाल है.?
कभी न मिलने वाली सुर - लय - ताल है
स्वार्थी दुनिया ने बनाई इसे अपनी ढाल है 
शतरंज की जैसे हर पल बदलती चाल है 

घर में अपना सिक्का जमाने के लिए 
दफ्तर में इज़्ज़त बढ़ाने के लिए
समाज में शौहरत कमाने के लिए
दाँव लगाते सालों साल है 
राजनीति भी कैसी कमाल है 

दुनिया पर राज करने के लिए 
सबका सरताज बनने के लिए 
तख्तों ताज पर बने रहने के लिए 
पहन लेते ऐसी कठोर खाल है 
राजनीति भी कैसी कमाल है 

बेईमानी पर ईमानदारी का नकाब चढ़ाने के लिए 
झूठ पर सच का मुखौटा लगाने के लिए 
कूट नीति के दाँव पेंच आज़माने के लिए 
निकाल लेते बाल की खाल है 
राजनीति भी कैसी कमाल है 

ये रास्ता आसान नहीं चलने के लिए 
वक़्त लगता है इसे समझने के लिए 
दूर रहना सदा इस चक्रव्यूह से बचने के लिए 
कर देती ये जीना बेहाल है 
राजनीति भी कैसी कमाल है 

अलका डांगी 


Friday, December 20, 2019

संयुक्त और एकल परिवार

Nuclear family! पता नहीं ये शब्द कहाँ से आया और किसने इसकी खोज की पर जिस तरह इसे हीन दृष्टि से देखा जाता है, वो एकल परिवारवालों के दिलों पर चोट करती है संयुक्त परिवार हो या एकल परिवार, परिवार आखि़र परिवार ही होता है |आपसी संबंध, जिम्मेदारियाँ, उतार- चढ़ाव, लड़ाई - झगड़े, ये तो हर एक परिवार का अभिन्न अंग है, तो फिर एकल परिवार को अपनी नजरों से उतार कर संयुक्त परिवार को ही महत्व क्यूँ दिया जाता है?

कोई नहीं चाहता की वो अपने घर-परिवार से दूर अकेला रैन बसेरा करे | जब आदमी उच्च शिक्षण, नौकरी या व्यापार के लिये परिवार से दूर बसता है तो इन सबके पिछे कोई वजह होती है | दूर रहकर भी वह अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है और समय निकालकर अपने परिवार वालों के साथ समय व्यतीत करने के सपने दिल में संजोए रखता है |

कुछ एक सम्बंध होते है ऐसे जहां माता पिता या किसी अन्य परिवार वालों से मतभेद या अनबन हो जाती है और सबकी सुख - शांति के लिए व्यक्ति चला जाता है अकेला अपना निर्वाह करने पर उसे भी अपने दिल पर पत्थर रख कर ऐसा करना पड़ता है

संयुक्त परिवार में जिम्मेदारियां बंट जाती है, सुख - दुख में एक दूसरे का सहारा मिल जाता है, बच्चे बड़े हो जाते सुख दुख में मिलकर   रहना सीखते  हैं , सगाई और शादी जैसे महत्वपूर्ण काम संपूर्ण रीति रिवाज और बिना किसी रुकावट के  संपन्न हो जाते हैं , एक ही आदमी को सारा बोझ नहीं उठाना पड़ता है |

वहीं एकल परिवार में घर - परिवार की जिम्मेदारी अकेले ही निभानी पड़ती है चाहे वो बच्चों  को पढ़ा लिखा कर बड़ा करना हो या कोई सुख दुख का समय हो.. और  पूरी जिंदगी ये सिद्ध करने में गुजर जाती है की हम भी परिवार से उतना ही प्यार करते हैं और उतना ही साथ रहना पसंद करते हैं बस फर्क़ इतना है कि हम दूर हैं इसलिए आप यहाँ आकर हमारे साथ रहना पसंद कम करते हैं और हम चाहकर भी साथ नहीं रह सकते 

ये बात और है कि दोनों परिवार में रहने वालों के अपने अपने अलग दृष्टिकोण है परंतु हमेशा तव्वजो संयुक्त परिवार वालों को ही मिलती है 

काश ये बात भारत की संस्कृति में रहने वालों को समझ आये और परिवार को एकल और संयुक्त की नजरों से तोलना बंद कर दें 


अलका डांगी 

Thursday, December 19, 2019

जिद्द

कुछ कर गुजरने की मन में ग़र जिद्द होती है
उसकी न कोई सीमा न कोई हद्द होती है 
दिल में यदि ग़र ये चाहत होती है 
उसे पूरा करने के लिए बेइंतहा मेहनत होती है 
और वो भी बेहिसाब, बेहद होती है 
संघर्ष करके ही तो आखिर 
मंजिल हासिल होती है 
जिसे पाने के लिए ये सारी 
जद्दोजहद होती है 
उसे पूरा करने की
खुशी भी अनहद होती है 
क्यूँ कि कुछ कर गुजरने की 
मन में जिद्द होती है 

अलका डांगी 





Sunday, November 24, 2019

बचपन

बचपन 
बच्चे और ये बचपन
कितना सरल होता है इनका जीवन 
रोते हैं तो पल में हँस जाते हैं 
रूठते हैं तो जल्द मन जाते हैं
टूटे हुए दिलों को जोड़ देते हैं 
चंचल, चुलबुले अंदाज से 
चेहरों पर मुस्कान दे जाते हैं 
कितना कोमल होता है इनका मन 
कितना सरल होता है इनका जीवन 
अमीर - गरीब में फर्क नहीं करते 
ऊँच - नीच का भेद नहीं समझते 
सबके संग घुल मिल जाते हैं 
सच्ची - सीधी बात करते हैं 
हर बात में नई बात सीखा जाते हैं 
कितना निर्दोष होता है इनका हर कथन 
कितना सरल होता है इनका जीवन 
कभी शरारत कभी बाल हठ करते 
लड़ते झगड़ते पर छल कपट नहीं करते 
अपने हाल में मस्त रहते 
सही मायने में जीवन जीते 
जीने के कई पाठ पढ़ा जाते हैं 
कितना लुभाता है इनका मस्त मौला पन
कितना सरल होता है इनका जीवन 

अलका डांगी 





Wednesday, October 9, 2019

अमिताभ बच्चन - सदी के महानायक

सदी के महानायक हैं
जिनके लाखों चाहक है
आदमी वो बेमिसाल
कला की है एक मिसाल

अपनी पहचान आप बनाई
मेहनत और लगन से कर के सगाई
इज़्ज़त  और शौहरत खुब कमाई
अपनी छवि ज़न ज़न के  मन में बसाई

जीवन में देखे कई उतार चढ़ाव
थककर लाए नहीं कोई ठहराव
हँसकर पार किया हर पड़ाव
अपने उच्च मनोबल का छोड़ा प्रभाव

बच्चे बुजुर्ग या हो जवान
सभी करते आपका सम्मान
आदर्श हैं आप सभी के
ऐसी आपकी प्रेरणा महान

आपके जन्‍मदिन की देते है ढेरों शुभकामना
आपका प्रेम सदा हम पर रहे यूं ही बना
तन - मन यूँ ही स्वस्थ रहे
जीवन में खुशियाँ आए सौगुना

अलका डांगी

Wednesday, September 25, 2019

पर्यावरण

पर्यावरण की रक्षा में हम भी एक कदम उठाते हैं
चलो मिलकर आज एक पेड़ लगाते हैं

सृष्टि की संरचना को जिंदा रखना है
प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप से बचना है
वर्तमान और भविष्य को उज्जवल करना है
आओ समय रहते चेत जाते हैं
पर्यावरण की रक्षा में हम भी एक कदम उठाते हैं

समय के साथ जरूर चलना है
पर बढ़ते हुए प्रदुषण को नियंत्रण करना है
आधुनिक यंत्र - तंत्र आज की जरूरत है
पर इसकी सीमा - मर्यादा को भी समझना है
इसके पहले की ये हमें हानि पहुंचाते हैं
पर्यावरण की रक्षा में हम भी एक कदम उठाते हैं

पेड़ - पौधें तो पशु - पक्षियों का आशियाना है
फल - फुल और जड़ी बूटियों का खजाना है
इनकी जरूरत को सबने जाना और माना है
हम सबको मिलकर इनका अस्तित्व बचाना है
चलो भावी पीढ़ी के लिए ये सौगात छोड जाते हैं

पर्यावरण की रक्षा में हम भी एक कदम उठाते हैं
चलो मिलकर आज एक पेड़ लगाते हैं

अलका डांगी

Saturday, August 31, 2019

क्षमा

क्षमा वीरों का भूषण है
क्षमा ही बडप्पन है
क्षमा प्रेम का दीप जलाती है
क्षमा संबंधों की मिठास बढ़ाती है

दिल को यदि ठेस पहुंची हो तो
रूठने का पूरा है तुमको हक
पर समझौता दिलों का कर देना
पलने देना न उसमें कोई शक

गलती किसी से भी हो सकती है
चाहे छोटा हो या बड़ा
नजरअन्दाज कर देना सभी 
जिंदगी जीने का है ये फलसफा 

शिकायत हो कोई तो उसे बयान कर देना
रिश्तों की गरिमा को सम्मान दे देना
दिल पर कोई बोझ न रखना
माफी माँग लेना या माफ कर देना

क्यूँ की क्षमा वीरों का भूषण है
क्षमा ही बड़प्पन है
क्षमा प्रेम का दीप जलाती है
क्षमा संबंधों की मिठास बढ़ाती है

अलका डांगी

Monday, August 26, 2019

पर्युषण

संतों का कर लो समागम
कि आया है पर्व पर्युषण
धर्म की कोरी बातें हुईं बहुत
अब कर लो तन - मन - धन समर्पण
कि आया है पर्व पर्युषण

राग - द्वेष से ऊपर उठना है
तप - ध्यान भी दिल से करना है
वीर - वाणी कर लो अर्जन
कि आया है पर्व पर्युषण

संसार में ही न उलझे रहना
आगम का भी सार है समझना
अंतरात्मा का कर लो दर्शन
कि आया है पर्व पर्युषण

संयम के पथ पर चले हर ज़न
छोड़ कर राग - द्वेष और कर्मों का बंधन
सरल हो जाए सबका अंतर्मन
कि आया है पर्व पर्युषण

भवोभव  से मुक्ति मिल जाए
प्रभु - वाणी आत्मसात कर जाए
छु ले प्रभुजी के चरण
कि आया है पर्व पर्युषण

अलका डांगी

Monday, August 12, 2019

तारीफ़

एक वक़्त था जब
तारीफ के लिए तरसते थे
हर लफ्ज़ तारीफ का सुनकर
हम और निखरते थे
अब तारीफ से डर लगता है
जाने क्यूँ तारीफ का हर शब्द अखरता है

तारीफ का एक अंदाज होता है
सच्चे दिल से करे तो
अपनेपन और खुशी का एहसास होता है
हर उम्र में रहती है इसकी चाहत
बढ़ाती है सबकी निगाह में इज़्ज़त

तारीफ तो हौसला अफजाई है
किसी के मेहनत की कमाई है
काबिल लगे तो जरूर व्यक्त कीजिए
पर झूठी तारीफ कर खुशामदी न कीजिए

तारीफ कार्य की शान बढ़ाती है
हर व्यक्ती को सम्मान दिलाती है
बेवजह इसकी महत्ता कम न हो जाए 

बेशक! जहाँ , जितनी , जिसको जरूरत है उतनी जरूर पा जाए 

आखिर तारीफ की भी तो अपनी मर्यादा होती है        

किसी व्यक्ति का प्रोत्साहन और कार्य की प्रशंसा इसमें निहित होती है                                                

इसका गौरव बरकरार रहेगा तब तक 

जब तक ये स्वार्थ से नहीं, प्रेम और दरियादिली से जुड़ किसीके हित में होती है 

अलका डांगी

Tuesday, August 6, 2019

मेरा देश - मेरा अभिमान

मेरे देश की है अलग पहचान
कोई सानी नहीं पुरी दुनिया में इसके समान
संस्कृति के खजाने से भरपुर
जैसे चमकता है हमारा कोहिनूर
भाँति - भाँति के लोग यहाँ
भिन्न - भिन्न है सबकी भाषा
अपना अपना परिवेश है
अंदाज है सबका हटके जरा सा
क्रिसमस, पोंगल, ईद या हो बैसाखी
हर इंसान उत्साह से मनाता यहाँ
होली, दिवाली और राखी
यहाँ की मिट्टी में मिला है
प्रेम, अपनत्व और भाईचारा
चाहे कोई जाति या मजहब
मुसीबत में बनते इक दूजे का सहारा
हर व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा है
देश, दुनिया में कहीं भी हो ठिकाना
नाज़ है हमें इसके अद्भुत सौंदर्य पर
इसकी छवि से मुग्ध है सारा ज़मानाा !! 

अलका डांगी

Friday, July 19, 2019

रिश्ते - नाते

ये रिश्ते, ये नाते
कुछ हमने बनाए
तो कुछ अपने आप है बन जाते
दिल से दिल के तार जुड़े रहे
तो इनकी अलग है गरिमा
ये तार छूट गए तो
जीवन के लय - ताल है बिगड जाते
प्रेम, विश्वास और बडप्पन
रिश्तों के अनमोल मोती हैं
त्याग और समर्पण के धागे से जुड़
ये और मजबुत है बन जाते
रिश्तों की मान - मर्यादा
उनका गौरव बढ़ाती है
जोर - जबरदस्ती से
ये बोझ है बन जाते
कोई इनके लिए
अपनी जिंदगी दाँव लगाते
तो कोई जीवन भर
इनका मुल्य ही नहीं समझ पाते
ये रिश्ते, ये नाते
ये हँसाते और रुलाते
ये रूठते और मनाते
पर एक दूसरे से दूर नहीं रह पाते
किस्मत वाले होते हैं वो
जो ये अनमोल नजराना पा जाते

अलका डांगी

Tuesday, July 9, 2019

दौड़


दौड़ 

हर इंसान में होड़ लगी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
कोई सर्वप्रथम आना चाहता है तो
कोई बुलंदियों को छुना चाहता है
किसी को कुछ पाना है
किसी को कुछ कर दिखाना है
जाने कैसी ये जंग छिड़ी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
हर शख्स हो रहा इसका शिकार
आगे बढ़ने का भूत है सब पर सवार
कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार
या इस पार या उस पार
जैसे नाव बिना पतवार
जाने कैसी ये हवा चली है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
शामिल हो गए हैं बच्चे और जवान
रहने लगे हर वक़्त परेशान
चैन और सुकून से अनजान
बस भीड़ में भाग रहे सब नादान
जाने कैसी ये आस जगी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
आगे बढ़कर आखिर क्या पाया
हर जीत ने अहम - गुरूर और बढ़ाया
भीड़ में ना अपना दिखा ना पराया
अपनी चाहत के आगे कुछ नजर ना आया
अब और किसकी चाह बची है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
एक दिन तो सभी को ठहरना होगा
जो मिला उसमें संतोष करना होगा
हर वक़्त हम किसीसे दौड़ लगाकर ही आगे बढ़े
ये सिलसिला अब बंद करना होगा
अपना श्रेष्ठ देकर खुश रहें 
ऐसा मंज़र हासिल करना होगा
आत्मसंतुष्टि से ही ये दौड़ रुकेगी 

फिर ना कोई होड़ मचेगी 

ऐसा नजरिया अंगीकार करना होगा 


अलका डांगी

Thursday, May 9, 2019

माँ !


माँ 

नौ महीने कोख में रखती हो
प्रसव की पीड़ा भी चुप चाप झेलती हो
हर सुख - दुख परिवार के लिए हँस कर सहती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

पालन - पोषण में दिन - रात एक करती हो
न जाने कब सोती, और कब जगती हो
कब वक्त निकालकर घर के कार्य पूर्ण करती हो
फिर भी सदा हँसती रहती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

अब तुम काम पर भी जाती हो
घर की जिम्मेदारी भी साथ निभाती हो
सब के लिए दूत बनकर आती हो
फिर भी तुम कभी नहीं थकती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

बच्चों को बड़ा जब कर लेती हो
वो सुने ना सुने, तुम उनकी सदा सुनती हो
बिन कहे भी सारे परिवार का दर्द समझती हो
अपने आँचल की छाँव में सबको सलामत रखती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

हर पल सबके आगे पीछे रहती हो
अपने लिए तुम कब जीती हो
परिवार के लिए अपनी जान छिड़कती हो
पर खुद पर कभी अभिमान नहीं करती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

ममता और करुणा की मूर्त हो
तुम दिल से भी कितनी ख़ूबसूरत हो
फिर क्यूँ अपना ध्यान नहीं रखती हो
अपनी अहमियत आप नहीं समझती हो
व्यर्थ सबकी चिंता करती रहती हो
कभी कोई शिकायत भी नहीं करती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

अलका डांगी 

Saturday, May 4, 2019

सवाल और बवाल

इसने क्या कहा ?
उसने क्या किया ?
क्यों उठाते हो ये सवाल?
क्यूँ करते हो इसकी - उसकी बातों पर बवाल?
इसका - उसका, जीने का अलग तरीका
सबकी अपनी सोच, सब का अलग सलीका
अच्छाई - बुराई करके तुमने क्या सीखा? 

किसीके जीवन में ना करो दखलअंदाजी
तभी रह पाएगा वह दिल से राजी
इसकी चुगली, उसकी बुराई
क्यूँ करते हो अपनी - पराई
सबके अपने कर्म, सबकी अपनी कहानी
सही क्या, गलत क्या, न इसने जानी न उसने मानी
क्यूँ चाहते हो फिर करवाना तुम अपनी मनमानी 

उसकी खुशी मैं  क्यूँ  होती तुम्हें जलन 

उसकी हँसी मैं क्यूँ होती तुम्हें चुभन 

काश झाँक लेते कभी तुम अपना भी मन

आसान हो जाता सभी का जीवन 

सुख-दुःख की वज़ह कोई नहीं 

कर लेते अगर आत्मचिंतन 

व्यर्थ नहीं जाती ये जिंदगानी 

ना होती बैचैनी ना ही कोई परेशानी 

अपने हृदय को कोमल और सरल रख

सबको अपने तरीके से जीने का है हक

न अगर कुछ समझ आए, तो कर लेना मौन धारण
पर बनना मत किसी के क्लेश का कारण
करना है तो नेकी कर, दरिया में डाल
पर फिर ना उठाना किसी पर कोई सवाल
न करना फिर कभी इसकी - उसकी बातों पर बवाल

अलका डांगी

Thursday, May 2, 2019

मंज़िल का सफर

ख्वाहिशों को पर लगाकर
सपनों को पूरा करो
मेहनत और पुरूषार्थ से
अपनी मंज़िल हासिल करो

रोकने टोकने वाले कठिन बनाएंगे सफर
चाहने वाले बनेंगे मिल का पत्थर
बिना रुके, बिना डरे आगे बढ़ो
मेहनत और पुरुषार्थ से अपनी मंज़िल हासिल करो

झूठ, बेईमानी और लालच
सफर में साथ देने के लिए उकसाएंगे
सच्चाई और ईमानदारी मंजिल पहुंचने पर सुकून दिलाएंगे
हौसले बुलंद कर, खुद पर विश्वाश रखो
आदर्श बनकर सबका दिल जीतो
मेहनत और पुरूषार्थ से
अपनी मंज़िल हासिल करो

अलका डांगी 

Tuesday, April 23, 2019

फुर्सत के पल

वो चाय की चुस्की और दोस्तों का साथ
हँसी, ठहाके और गपशप की क्या बात
दिल खोल कर रख देते हैं
ऐसे फुर्सत के पल रोज कहाँ मिलते है
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैँ

आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं 

इज्जत, शौहरत खूब कमाई
पैसों से भी की खूब सगाई
अब दोस्तों के साथ चंद लम्हों के लिए तरसते हैं
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैं

आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं 

संसार की माया जाल में उलझे रहे
कुछ शब्द रह गए कहे-अनकहे
दोस्तों के सिवाए उन्हे कौन समझते हैं
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैं

आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं 

उम्र की दराज पर जब आकर बैठते हैं
एक दूसरे का दर्द कहते और सुनते हैं
सुकून और राहत की साँस तब लेते हैं
ऐसे फुर्सत के पल रोज कहाँ मिलते हैं
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैं 

आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं 

अलका डांगी 

Monday, April 15, 2019

मतदान

एक बार फिर मतदान होना है
जनता ने अपने नए मंत्री को चुनना है
वैसे तो ये क्रम सदियों से चला आ रहा है
शायद जनता को भी वोट देने में मजा आ रहा है
सबके मन में एक नयी उमंग है
क्यूँ न हो, नए मंत्री को चुनने की जो जंग है
नयी पार्टी, नए उम्मीदवार, साथ ही कुछ नए वादे भी
प्रजा को खुश करने और देश की उन्नति के इरादे भी
कौन सही है कौन गलत ये तो वक्त ही बताएगा
परंतु इस वक्त वोट किसे दिया जाये प्रश्न ये सताएगा
उम्मीद है कोई व्यक्ति ऐसा चुन लिया जाएगा
जो देश को हर आने वाले संकट से बचा पाएगा
अब तो इस देश को संभालनेवाले की जरूरत है
भारत माँ को एक रखवाले की जरूरत है

अलका डांगी

Thursday, April 11, 2019

योग




योग  !

सदियों पुरानी संस्कृति है योग
भारत का अभिन्न अंग और कृति है योग
सारी दुनिया पर हो रहा हावी
शारीरिक मानसिक संतुलन की है ये चाबी
योग के प्रकार अनेक
पर सभी का मकसद है एक
आसन करो या प्राणायम
थकान दूर कर, देता आराम
श्वाछोश्वाश का है ये खेल इसका नहीं कोई मेल
बच्चें, बड़े सभी इसे अपनाएं
स्वस्थ तन-मन, निरोगी काया पाएँ

अलका डांगी

Wednesday, April 10, 2019

भाषा का स्वभाव

अभिव्यक्ति का माध्यम है
स्वभाव की परिभाषा
अपना अपना अंदाज है
सबकी अपनी अपनी भाषा
संबंधों को मधुर बनाती
कभी स्वजनों से दूर कराती
व्यंग्य कटाक्ष से ठेस पहुँचाती
हास्य से चेहरों पर मुस्कान बिखराती
हर पल अपना अलग रंग दिखलाती
चंचल चतुर और चालाक भी है भाषा
सीधी, सरल जल्द समझ आती
गोल गोल माया का जाल बनाती
कभी रिश्ते बनाती
कभी चक्रव्यूह में है उलझाती
मगर प्रेम और सत्य से ईश्वर के करीब ले जाती है भाषा
और सबसे मासूम एवं निर्दोष होती है
बच्चों के कोमल मन की भाषा
न माप तौल कर बोली जाती
ना ही किसी का दिल दुखाती
सबके मन को लुभाती
इतनी प्यारी हो सबकी भाषा
विनय विवेक और मिठास से जुड़ी रहे
ना रहे कोई आशा और निराशा
अपना अपना अंदाज
अपनी अपनी भाषा

अलका डांगी 

Sunday, April 7, 2019

श्रद्धांजलि

एक नन्ही सी जान थी वो
माता पिता की शान थी वो
मन में बड़े अरमान और सपने थे
उस मासूम के लिए तो सभी अपने ही थे
मायके से विदा हुई थी नयी दुनिया बसाने
नयी उमंग नए विश्वास के साथ हंसने हँसाने
पर जिन्हे अपना समझा था
वो तो निकले बेगाने
किसी से बयान न कर सकी अपने  दुख भरे अफसाने
समाज की कुरीतियों के जाल में फँस गयी
एक हसीन चुलबुली बेटी अपने ही ससुराल की बलि चढ़ गयी
हमारी बेटी की कमी तो कभी पूरी न हो पाएगी
पर ऐसे निर्दयी बेरहम इंसानों को ये दुनिया जरूर सबक सिखायेगी

विनीता को समर्पित 🙏

अलका डांगी

गैजेटस और मासूम बचपन

गुमसुम से बैठे हैं बच्चे हमारे
गैजेटस की दुनिया में कौन इन्हे पुकारे
खिलौने तो है ढेर सारे
पर कब तक खेले इनके सहारे
मित्र, सहेली सब कहा खो गई
मोबाइल और लैपटॉप ही अब उनकी दुनिया हो गई
वो पकडा पकड़ी, छुपाछुपी और लगोरी
और वो रस्सीखींच की जोरा - जोरी
कोई आज इन्हे ये सब भी सिखाए
टीवी मोबाइल से कहीं दूर ले जाए
हकीकत और भ्रम का फर्क इन्हें समझाएँ
कहीं गैजेटस की दुनिया में ये अपना मासूम बचपन न खो जाएँ 

अलका डांगी