इंसान की प्रकृति को
हर समुदाय की संस्कृति को
बदलाव की प्रवृत्ति को
उभरती नौजवान पीढ़ी की वृत्ति को
आवकार देना ही सच्ची प्रीत है
स्वीकार करना ,आगे बढ़ना ही जीवन की रीत है
अपनी बदलती तकदीर को
नियति की बनाई तस्वीर को
जैसे प्रकाश वैसे ही तिमिर को
बसंत के बाद शिशिर को
अपनाकर समय के साँचे में ढलना ही समझ की नीत है
स्वीकार करना , आगे बढ़ना ही जीवन की रीत है
सुख - शान्ति भरे संसार में
अचानक उठते तुफान को
स्वस्थ जीवन में घुसपैठ करती
बीमारियों के घमासान को
हर कदम पर परीक्षा लेती
चुनौतियों के आह्वान को
सूझ-बूझ की ढ़ाल से डटकर सामना करने में ही संयम की जीत है
स्वीकार करना , आगे बढ़ना ही जीवन की रीत है
अलका डांगी