बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है
खेत-खलिहान की हरियाली से
सुबह की लाली और ढलती शाम मतवाली से
शुद्ध हवा में साँस लेता है
मेरा गाँव आज भी बेपरवाह होकर जीवन जीता है
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है
चरवाहों के संग चलते भेड़ बकरियों की कतारों से
पशु पक्षियों की मधुर पुकारों से
नीम और पीपल के छांव के किनारों से
पर्वतों और पहाडियों के बीच आशियाना सजता है
मेरा गाँव आज भी खुले आसमान में अंगड़ाई लेता है
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है
सिर पर छलकता हुआ पानी का घड़ा लेकर चलती मस्त चालों से
नुक्कड़ पर लगते गरमागरम चाय के ठेलों से
सड़कों पर बेफिक्र खेलते बच्चों और बुजुर्गों के आपसी मेलों से
अपनेपन और सादगी के साथ सरलता से
मेरा गाँव आज भी इन्सानियत और जिन्दादिली की मिसाल कायम करता है
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है
नदी में बहते चंचल पानी के बहाव से
तालाब के पानी के ठहराव से
सादी साग रोटी के हर निवाले में गाँव की मिट्टी के स्वाद से
हर आत्मा संतृप्त करता है
मेरा गाँव आज भी मंद गति से चलकर भी खुश रहता है
बेचैन मन को चैन और सुकून का जीवन देता है
अलका डांगी
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