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Wednesday, December 18, 2024

चुल्हा !

चूल्हा 

रसोई घर की रंगत है 
अग्नि की संगत है 
जलकर सब की भूख शांत करता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

कभी धीमी तो कभी तेज गति 
जरूरत अनुसार लय-ताल बदलता है 
अन्न के हर निवाले में स्वाद भरता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

वार- त्यौहार , प्रसंग अनुसार सदाबहार मचलता है 
अपनों के गम में शोक व्यक्त कर बुझता है 
फिर दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

अमीर गरीब हर घर 
गांव  - शहर ,  प्रकृति वही,  पर रूप बदलकर 
सबको चैन से सुला कर ठंडी आह भरता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है

अलका डांगी 

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