चूल्हा
अग्नि की संगत है
जलकर सब की भूख शांत करता है
दिन निकलता है
हर घर चूल्हा जलता है
कभी धीमी तो कभी तेज गति
जरूरत अनुसार लय-ताल बदलता है
अन्न के हर निवाले में स्वाद भरता है
दिन निकलता है
हर घर चूल्हा जलता है
वार- त्यौहार , प्रसंग अनुसार सदाबहार मचलता है
अपनों के गम में शोक व्यक्त कर बुझता है
फिर दिन निकलता है
हर घर चूल्हा जलता है
अमीर गरीब हर घर
गांव - शहर , प्रकृति वही, पर रूप बदलकर
सबको चैन से सुला कर ठंडी आह भरता है
दिन निकलता है
हर घर चूल्हा जलता है
अलका डांगी
No comments:
Post a Comment