दस्तक !
दिन - रात चलता था जो शहर
अचानक थम सा गया है
बेख़ौफ़, मदमस्त रहता था जो इंसान आज सहम सा गया है
सुरक्षित है अपने ही आशियाने में
फिर भी क़ैदियों की तरह जंजीरों में फंस सा गया है
समय बहुत है सभी के पास
पर वक़्त जैसे रुक सा गया है
सब्र और सावधानी का हो रहा है इम्तिहान
जूझ रहा है जिससे आज सारा जहाँ
मानवता और प्रकृति के साथ खिलवाड का नतीजा
जैसे हर इंसान भुगत सा रहा है
अब भी समय है सम्भल जाना हे मानव!
जैसे कोई दस्तक देकर चेतावनी दे सा रहा है |
अलका डांगी
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