आसमान के पट से निकलती सूरज की पहली किरण
मुस्कराते हुए देती है सब को जैसे नया जीवन
अद्भुत होता है नित्य दिन ये दर्शन
नया सवेरा, नई आशा, प्रफुल्लित हो उठता हर मन
अपने आशियाने से बाहर निकल व्यस्त हो जाता जनजीवन
कहीं प्रभु भक्ति में लीन भक्त करते भजन कीर्तन
कहीं योगाभ्यास और व्यायाम में ओत प्रोत होते तन बदन
कहीं हँसता मुस्कराता विद्यालय जाता बचपन
और कहीं चाय की चुस्की और अखबार में ताजगी ढूंढता मन
कहीं पक्षियों की चहचहाहट, कहीं घंटियों की टन टन
कहीं कलियाँ खिल खिलाकर फूल बन , महकाती है उपवन
अपनी अपनी दिनचर्या में रमता हुआ हर ज़न
दिन - रात के इस फेरे का सदियों से है चलन
जैसे हर रात के साये से मुस्कराकर फिर बाहर निकलती सूरज की पहली किरण
ऊर्जा से भर देती है फिर से सब का जीवन
वैसे ही अंधेरे चिर कर तु भी उजला कर दे सारा चमन खुशियाँ लुटा , दुःख दर्द में किसीका सहारा बन
नेकी और बदी में करदे अपने आप को अर्पण
मिट जाएगी जीवन चक्र की सारी थकन
बनना है तो बन जा सूरज की किरण
ऊर्जा से भर दे फिर सब का जीवन
अलका डांगी
1 comment:
बहुत सुंदर ! Inspiring !
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