नेतृत्व करने के लिए किसीको बढ़ाना पड़ता है कदम
देखा-देखी सभी आगे बढ़ते हैं
और अलग सोच वाले ही दुनिया में लहराते अपना परचम
पर अलग सोच हो तो मनमर्जी से अपनी मंजिल चुनना तिरस्कार नहीं होता
समुह से बाहर निकल कर स्वयं की पहचान बनाना समुह का बहिष्कार नहीं होता
प्रेम, करुणा और निष्ठा जीवित है जहन में जब तक
समुह से अलग होकर भी उसके प्रति कम उसका प्यार नहीं होता
फिर क्यूँ ये शिकायत करती है दुनिया हरदम
जब भी अलग अकेले हिम्मत कर उठाता कोई कदम
क्यूँ आंकने लगते किसीको ज्यादा किसी को कम
चाहे समुह में रहे या अलग दूर करने होंगे सारे भ्रम
कि अपने नैतिक मूल्यों से ही सार्थक होता है इन्सान का हर जन्म |
अलका डांगी
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