परिवार का हो तुम ऐसा अमूल्य गहना
छोटी उम्र बड़ी जिम्मेदारियाँ
कैसे निभाती गई तुम हमेशा बहना
सहनशीलता की मूर्त बनकर
हर चुनौती को मात देकर
सुख-दुख में अपनों की ढाल बनकर
सदा अटल खड़ी थी तुम बहना
सरल मन सीधी बात
ईमानदारी और सच्चाई का चोला सदा पहना
अपनी महत्वाकांक्षा और सपने छोड़
निःस्वार्थ भाव से कैसे परिवार में तुम ढलती गई बहना
चिंता और परवाह सब की बराबर
मन में सबके लिए दया और करुणा
धर्म और आध्यात्मिक जीवन अपनाकर
कैसे तप त्याग में समर्पित होती गई तुम बहना
तुम्हारे पुण्योदय का फूल खिला है
वर्षीतप का आभूषण जो तुमने झेला
हर्ष उल्लास की ये मंगल बेला
पूरे परिवार का तुम्हारे आँगन में लगा है जैसे मेला
तुम्हारे त्याग और समर्पण की देन कहें इसे
या भगवान का आशिर्वाद है ये बहना
हम सब की दुआओं में सदैव रहना
खुशियाँ कदम चूमे सारे जहाँ की
हँसता मुस्कराता फलता-फूलता रहे तुम्हारा घर अंगना
चाहे तप करो या कोई भी कार्य
प्रगति पथ पर हमेशा आगे बढ़ते रहना
ओ बहना दीदी कहूँ या छोटी माँ चाहिए कहना
अपना प्रेम सब पर यूँ ही बनाए रखना
अलका डांगी
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