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Thursday, May 9, 2019

माँ !


माँ 

नौ महीने कोख में रखती हो
प्रसव की पीड़ा भी चुप चाप झेलती हो
हर सुख - दुख परिवार के लिए हँस कर सहती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

पालन - पोषण में दिन - रात एक करती हो
न जाने कब सोती, और कब जगती हो
कब वक्त निकालकर घर के कार्य पूर्ण करती हो
फिर भी सदा हँसती रहती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

अब तुम काम पर भी जाती हो
घर की जिम्मेदारी भी साथ निभाती हो
सब के लिए दूत बनकर आती हो
फिर भी तुम कभी नहीं थकती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

बच्चों को बड़ा जब कर लेती हो
वो सुने ना सुने, तुम उनकी सदा सुनती हो
बिन कहे भी सारे परिवार का दर्द समझती हो
अपने आँचल की छाँव में सबको सलामत रखती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

हर पल सबके आगे पीछे रहती हो
अपने लिए तुम कब जीती हो
परिवार के लिए अपनी जान छिड़कती हो
पर खुद पर कभी अभिमान नहीं करती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

ममता और करुणा की मूर्त हो
तुम दिल से भी कितनी ख़ूबसूरत हो
फिर क्यूँ अपना ध्यान नहीं रखती हो
अपनी अहमियत आप नहीं समझती हो
व्यर्थ सबकी चिंता करती रहती हो
कभी कोई शिकायत भी नहीं करती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

अलका डांगी 

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