Followers

Tuesday, July 9, 2019

दौड़


दौड़ 

हर इंसान में होड़ लगी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
कोई सर्वप्रथम आना चाहता है तो
कोई बुलंदियों को छुना चाहता है
किसी को कुछ पाना है
किसी को कुछ कर दिखाना है
जाने कैसी ये जंग छिड़ी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
हर शख्स हो रहा इसका शिकार
आगे बढ़ने का भूत है सब पर सवार
कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार
या इस पार या उस पार
जैसे नाव बिना पतवार
जाने कैसी ये हवा चली है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
शामिल हो गए हैं बच्चे और जवान
रहने लगे हर वक़्त परेशान
चैन और सुकून से अनजान
बस भीड़ में भाग रहे सब नादान
जाने कैसी ये आस जगी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
आगे बढ़कर आखिर क्या पाया
हर जीत ने अहम - गुरूर और बढ़ाया
भीड़ में ना अपना दिखा ना पराया
अपनी चाहत के आगे कुछ नजर ना आया
अब और किसकी चाह बची है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
एक दिन तो सभी को ठहरना होगा
जो मिला उसमें संतोष करना होगा
हर वक़्त हम किसीसे दौड़ लगाकर ही आगे बढ़े
ये सिलसिला अब बंद करना होगा
अपना श्रेष्ठ देकर खुश रहें 
ऐसा मंज़र हासिल करना होगा
आत्मसंतुष्टि से ही ये दौड़ रुकेगी 

फिर ना कोई होड़ मचेगी 

ऐसा नजरिया अंगीकार करना होगा 


अलका डांगी

2 comments:

Prachi Kothari said...

बहुत बहुत सुंदर !!

Shilpa said...

Beautiful sis..