कुछ करो या न भी करो पर करने का दिखावा जरूरी है!
दूसरों के काम को अपना बताकर
श्रेय खुद ले जाना जरूरी है !
और इसी क्रम में दूसरों को नीचा दिखाकर
अपना सिक्का जमाना जरूरी है !
क्या यहाँ झूठी चाहत और अपनापन दिखाना जरूरी है !
सच्चे दिल से हो न हो पर एहसास दिलाना जरूरी है !
भीतर नफरत और कड़वाहट भरी है !
फिर भी प्रेम का नकाब चढ़ाना जरूरी है.!
क्या यहाँ समाज के हर रीति रिवाज निभाना जरूरी है !
सही हो या गलत पर आडंबर अपनाना जरूरी है !
विद्रोह की आवाज उठे अगर तो
संस्कारों की दुहाई देकर उसे दबाना जरूरी है !
नहीं....
क्यूँकी यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो
दो रूप नहीं धारण करते हैं
जैसा मन है वैसा ही आचरण करते हैं
गलती हो तो निःसंकोच स्वीकार करते हैं
न किसीकी राह में रुकावट बनते हैं
न मन में छल कपट की भावना रखते हैं
भीड़ में न चलकर अपनी राह खुद तय करते हैं
क्यूँ कि यहाँ सरल और निर्मल मन होना जरूरी है
बाह्य और अंतर्मन एक होना जरूरी है
जीवन सिर्फ जीना ही नहीं सफल और सार्थक बनाना जरूरी है
और इंसान के मन में इन्सानियत होना जरूरी है
अलका डांगी
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