Patriarchy , feminism या इंसानियत. ?
और feminism ही उसे burst करता है
सदियों से चल रही इस कुव्यवस्था के खिलाफ feminism हर दिन अपने हक की लड़ाई लड़ता है
और स्त्रियों के वज़ूद की खातिर ये संघर्ष निरंतर चलता है
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जब ये धुंआ उठता है
तभी बदलाव आता है, समाज सुधरता है
और हर द्वार स्त्रीयों के लिए खुलता है
पर patriarchy के नाम पर
हर एक पुरुष के खिलाफ विद्रोह और नफरत की ज्वाला तो नहीं जगा सकते
उसके हर कार्य पर patriarchy का नकाब तो नहीं चढ़ा सकते
feminism का गलत फायदा उठाकर हर पुरुष को गलत तो नहीं ठहरा सकते
हर पुरुष को patriarchy की बलि तो नहीं चढ़ा सकते
सदियों से चल रही patriarchy की परंपरा को
तोड़कर बाहर निकलने का भरसक प्रयत्न कर रहा है जो पुरुष वर्ग
उसे दिल से जरूर अपना सकते हैं
स्त्रियों की समानता और इज्जत को प्राथमिकता देने वाले हर पुरुष के साथ
कदम से कदम मिला सकते हैं
प्रेम और सरलता से किसी के भी स्वाभिमान को बिना ठेस पहुंचाये
धीरे-धीरे patriarchy को जड़ से मिटा सकते हैं
स्वस्थ समाज के संचालन में स्त्री-पुरूष दोनों ही
एक रथ के दो पहिये हैं
जो ज़ंग से नहीं अपितु संग और संतुलन से चला सकते है
विद्रोही बनकर नहीं बल्कि परिस्थतियों को समझकर साथ निभा सकते है
सारे पूर्वाग्रह मिटा स्त्री पुरुष की समानता का सभी को परिचय करा सकते हैं |
फिर patriarchy और feminism से ऊपर उठकर इन्सानियत का एक हसीन जहान बना सकते हैं
अलका डांगी
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