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Thursday, March 4, 2021

जीवन की संध्या!!

शर्माजी बहुत ही सीधे सरल, आदर्शों पर चलने वाले नीति वादी व्यक्ति थे। एक छोटे से गाँव से बाहर निकलकर अपनी मेहनत और लगन से खूब पढ़ लिख कर अपने बल बूते एक आदर्श शिक्षक बने और परिवार का गौरव बढ़ाया l पूरी जिंदगी में उन्होंने अपने उसूलों और अनुशासन से एक अलग मकाम हासिल किया l

अपने शिक्षण काल में अपने विद्यालय और अपने कार्यक्षेत्र की दिलों जान से  निःस्वार्थ भाव से सेवा की और उनकी प्रगति में पूरा योगदान दिया l उनकी ईमानदारी और शिक्षा के प्रति उनके इस योगदान के लिए उन्हें सरकार की तरफ से सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ l घर परिवार और दोस्तों के लिए भी सदा खुशी खुशी हर वक़्त सबकी मदद के लिये तैयार रहते थे और  सभी में खूब इज्ज़त कमाई l परन्तु इस दरमियान कभी भी उन्होंने कोई शौक पूरा नहीं किया न ही घर परिवार और अपने कार्य (शिक्षण) के अलावा कुछ और सोचा भी l धीरे धीरे जब वे रिटायर्मेंट की कगार पर पहुंचे तो अपने आपको खाली महसूस करने लगे l अब उन्हें अपनी चिंता और अपने परिवार की चिंता सताने लगी l ऐसा नहीं था कि वे पैसे से समृद्ध नहीं थे, उनके पास पूर्वजो की जमीन जायदाद और अपनी जिंदगी भर की मेहनत का अपार धन भी था जिससे वे अपनी पूरी जिंदगी खुशी से बैठ कर निकाल सकते थे l पर  अत्यधिक सोच और चिंता के कारण उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वे धीरे-धीरे हर काम के लिए दूसरों पर आश्रित होते गए और अपना आत्मविश्वास और मनोबल खोने लगे | ऊपर से स्वस्थ दिखते पर आत्मा सदा परेशान रहने लगी |
जब आदमी अपने फैसले खुद न लेकर दूसरों पर आश्रित होता जाता है तब वह धीरे-धीरे अपने आपको पंगु बना रहा होता है l पूरी जिंदगी मेहनत और लगन से हासिल किया हुआ पैसा अब उन्हें अखरने लगा l अपनी नकारत्मक सोच और बुढ़ापे की चिंता धीरे-धीरे जहर बनकर उनके शरीर में फैल गई और अलग अलग बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया l अब वे चाहकर भी अपने आप को इस भँवर से बाहर नहीं निकाल पा रहे थे अपनी जिंदगी का हर क्षण चिंता में गुजारने लगे |

ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति की हालत बुढ़ापे में ऐसी ही होती है!!

बहुत से बुजुर्ग अपनी शेष जिंदगी अपने पुराने शौक पूरा करने या फिर नया शौक पालकर उसमें खुश रहते हैं l कोई समाजसेवा तो कोई धर्म ध्यान और अध्यात्म में अपने आपको समर्पित कर देते हैं और जीवन को जैसा है उसे अपनाकर जीवन सफ़ल करने की कोशिश करते हैं l
इसमें भी अलग अलग पहलू होते हैं, किसी आदमी के पास बुढ़ापे में अपना जीवन व्यतित करने जितना धन होता है और शरीर से भी स्वस्थ रहता है और परिवार वालों का प्रेम और सहयोग होता है तो वह अपनी मर्जी से जीता है और दूसरों पर शारीरिक और आर्थिक रूप से आश्रित नहीं होता इसलिए खुश भी रहता है l कोई आदमी बुढ़ापे में इतना सक्षम नहीं होता पैसे और शरीर से परंतु फिर भी सबका प्रेम और सहयोग प्राप्त हो तो परिवार वालों के हिसाब से ढल जाता है और उसी मे संतुष्ट हो जाता है l कोई इंसान आर्थिक और शारीरिक रूप से भी थोड़ा कमजोर होता है और परिवार में भी आपसी क्लेश एवं कलह तथा मनमुटाव चलता है तो उसे दिन रात तानों का सामना करना पड़ता है और मन मारकर चुपचाप सब कुछ सहन करते हुए जीवन का यह पड़ाव जैसे-तैसे गुजारना पड़ता है | और कोई शर्माजी की तरह होते हैं जो सब कुछ होते हुए भी अपनी जिंदगी डर और चिंता में व्यतित करते हैं और सदा दूसरों को खुश रखने और किसीका दिल नहीं दुखे इस सोच में अपने आपको दुखी करते रहते हैं l उनके अंदर एक अनजाना भय रहता है कि अब आखिरी वक़्त में उनका और उनकी पत्नी का क्या होगा, कौन बुढ़ापे में उनकी सेवा करेगा? वे किसी पर आश्रित होना भी नहीं चाहते परन्तु उन्हें ये भी नहीं पता पडता है कि वो  अनजाने में इतना ज्यादा आश्रित हो चुके होते हैं कि अब वे चाहकर भी अपना निर्णय नहीं ले पाते और अपनों की इजाजत के बिना कुछ भी करने में अपने आप को सक्षम नहीं समझते हैं और एक लाचार जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं 
-कहीँ कहीं अपनी इस हालत का जिम्मेदार किसी हद्द तक इंसान खुद भी होता है क्योंकि व्यर्थ की चिंता करते-करते बुढ़ापे तक पहुँचते पहुँचते अपने आज और भविष्य दोनों का कंट्रोल अनजाने में किसी और के हाथों में खुद ही देते है और अपनी शेष जिन्दगी दुखी होकर व्यतित करने के लिए मजबूर हो जाते है l 

ऐसे वक़्त में परिवार वालों का प्यार और सहयोग ही उन्हें हिम्मत और खुशियाँ दे सकता है बशर्ते परिवार के सदस्य उनकी इस हालत और परिवर्तन को समझे स्वीकार करें और उन्हें इस परिस्थिति से बाहर निकालने का प्रयत्न करें | कहते है बच्चे और बुजुर्ग दोनों को संभालना लगभग समान होता है |दोनों को ही प्यार विश्वास और सुरक्षा का सहारा चाहिए होता है तभी वे खुश और निश्चिन्त होकर जीते हैं |और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है 

यह बहुत ही दुखदायी परंतु सच्ची हकीकत है जिसे हर कोई समझ नहीं सकता और शायद स्वीकार भी नहीं कर सकता कि कैसे एक व्यक्ति जिसने अपने जीवन की सुबह बहुत ही हंसते- खेलते आराम से गुजारी वो जीवन की संध्या में पहुँचते पहुँचते दुःख दर्द  और मानसिक पीड़ा  और  परिवार की तकलीफ़ों से परेशान होकर इस जीवन को  चुपचाप अलविदा कर के  एक दिन अचानक चले जाते हैं |

अलका डांगी 

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