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Saturday, August 31, 2019

क्षमा

क्षमा वीरों का भूषण है
क्षमा ही बडप्पन है
क्षमा प्रेम का दीप जलाती है
क्षमा संबंधों की मिठास बढ़ाती है

दिल को यदि ठेस पहुंची हो तो
रूठने का पूरा है तुमको हक
पर समझौता दिलों का कर देना
पलने देना न उसमें कोई शक

गलती किसी से भी हो सकती है
चाहे छोटा हो या बड़ा
नजरअन्दाज कर देना सभी 
जिंदगी जीने का है ये फलसफा 

शिकायत हो कोई तो उसे बयान कर देना
रिश्तों की गरिमा को सम्मान दे देना
दिल पर कोई बोझ न रखना
माफी माँग लेना या माफ कर देना

क्यूँ की क्षमा वीरों का भूषण है
क्षमा ही बड़प्पन है
क्षमा प्रेम का दीप जलाती है
क्षमा संबंधों की मिठास बढ़ाती है

अलका डांगी

Monday, August 26, 2019

पर्युषण

संतों का कर लो समागम
कि आया है पर्व पर्युषण
धर्म की कोरी बातें हुईं बहुत
अब कर लो तन - मन - धन समर्पण
कि आया है पर्व पर्युषण

राग - द्वेष से ऊपर उठना है
तप - ध्यान भी दिल से करना है
वीर - वाणी कर लो अर्जन
कि आया है पर्व पर्युषण

संसार में ही न उलझे रहना
आगम का भी सार है समझना
अंतरात्मा का कर लो दर्शन
कि आया है पर्व पर्युषण

संयम के पथ पर चले हर ज़न
छोड़ कर राग - द्वेष और कर्मों का बंधन
सरल हो जाए सबका अंतर्मन
कि आया है पर्व पर्युषण

भवोभव  से मुक्ति मिल जाए
प्रभु - वाणी आत्मसात कर जाए
छु ले प्रभुजी के चरण
कि आया है पर्व पर्युषण

अलका डांगी

Monday, August 12, 2019

तारीफ़

एक वक़्त था जब
तारीफ के लिए तरसते थे
हर लफ्ज़ तारीफ का सुनकर
हम और निखरते थे
अब तारीफ से डर लगता है
जाने क्यूँ तारीफ का हर शब्द अखरता है

तारीफ का एक अंदाज होता है
सच्चे दिल से करे तो
अपनेपन और खुशी का एहसास होता है
हर उम्र में रहती है इसकी चाहत
बढ़ाती है सबकी निगाह में इज़्ज़त

तारीफ तो हौसला अफजाई है
किसी के मेहनत की कमाई है
काबिल लगे तो जरूर व्यक्त कीजिए
पर झूठी तारीफ कर खुशामदी न कीजिए

तारीफ कार्य की शान बढ़ाती है
हर व्यक्ती को सम्मान दिलाती है
बेवजह इसकी महत्ता कम न हो जाए 

बेशक! जहाँ , जितनी , जिसको जरूरत है उतनी जरूर पा जाए 

आखिर तारीफ की भी तो अपनी मर्यादा होती है        

किसी व्यक्ति का प्रोत्साहन और कार्य की प्रशंसा इसमें निहित होती है                                                

इसका गौरव बरकरार रहेगा तब तक 

जब तक ये स्वार्थ से नहीं, प्रेम और दरियादिली से जुड़ किसीके हित में होती है 

अलका डांगी

Tuesday, August 6, 2019

मेरा देश - मेरा अभिमान

मेरे देश की है अलग पहचान
कोई सानी नहीं पुरी दुनिया में इसके समान
संस्कृति के खजाने से भरपुर
जैसे चमकता है हमारा कोहिनूर
भाँति - भाँति के लोग यहाँ
भिन्न - भिन्न है सबकी भाषा
अपना अपना परिवेश है
अंदाज है सबका हटके जरा सा
क्रिसमस, पोंगल, ईद या हो बैसाखी
हर इंसान उत्साह से मनाता यहाँ
होली, दिवाली और राखी
यहाँ की मिट्टी में मिला है
प्रेम, अपनत्व और भाईचारा
चाहे कोई जाति या मजहब
मुसीबत में बनते इक दूजे का सहारा
हर व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा है
देश, दुनिया में कहीं भी हो ठिकाना
नाज़ है हमें इसके अद्भुत सौंदर्य पर
इसकी छवि से मुग्ध है सारा ज़मानाा !! 

अलका डांगी

Friday, July 19, 2019

रिश्ते - नाते

ये रिश्ते, ये नाते
कुछ हमने बनाए
तो कुछ अपने आप है बन जाते
दिल से दिल के तार जुड़े रहे
तो इनकी अलग है गरिमा
ये तार छूट गए तो
जीवन के लय - ताल है बिगड जाते
प्रेम, विश्वास और बडप्पन
रिश्तों के अनमोल मोती हैं
त्याग और समर्पण के धागे से जुड़
ये और मजबुत है बन जाते
रिश्तों की मान - मर्यादा
उनका गौरव बढ़ाती है
जोर - जबरदस्ती से
ये बोझ है बन जाते
कोई इनके लिए
अपनी जिंदगी दाँव लगाते
तो कोई जीवन भर
इनका मुल्य ही नहीं समझ पाते
ये रिश्ते, ये नाते
ये हँसाते और रुलाते
ये रूठते और मनाते
पर एक दूसरे से दूर नहीं रह पाते
किस्मत वाले होते हैं वो
जो ये अनमोल नजराना पा जाते

अलका डांगी

Tuesday, July 9, 2019

दौड़


दौड़ 

हर इंसान में होड़ लगी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
कोई सर्वप्रथम आना चाहता है तो
कोई बुलंदियों को छुना चाहता है
किसी को कुछ पाना है
किसी को कुछ कर दिखाना है
जाने कैसी ये जंग छिड़ी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
हर शख्स हो रहा इसका शिकार
आगे बढ़ने का भूत है सब पर सवार
कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार
या इस पार या उस पार
जैसे नाव बिना पतवार
जाने कैसी ये हवा चली है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
शामिल हो गए हैं बच्चे और जवान
रहने लगे हर वक़्त परेशान
चैन और सुकून से अनजान
बस भीड़ में भाग रहे सब नादान
जाने कैसी ये आस जगी है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
आगे बढ़कर आखिर क्या पाया
हर जीत ने अहम - गुरूर और बढ़ाया
भीड़ में ना अपना दिखा ना पराया
अपनी चाहत के आगे कुछ नजर ना आया
अब और किसकी चाह बची है
जाने कैसी ये दौड़ लगी है
एक दिन तो सभी को ठहरना होगा
जो मिला उसमें संतोष करना होगा
हर वक़्त हम किसीसे दौड़ लगाकर ही आगे बढ़े
ये सिलसिला अब बंद करना होगा
अपना श्रेष्ठ देकर खुश रहें 
ऐसा मंज़र हासिल करना होगा
आत्मसंतुष्टि से ही ये दौड़ रुकेगी 

फिर ना कोई होड़ मचेगी 

ऐसा नजरिया अंगीकार करना होगा 


अलका डांगी

Thursday, May 9, 2019

माँ !


माँ 

नौ महीने कोख में रखती हो
प्रसव की पीड़ा भी चुप चाप झेलती हो
हर सुख - दुख परिवार के लिए हँस कर सहती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

पालन - पोषण में दिन - रात एक करती हो
न जाने कब सोती, और कब जगती हो
कब वक्त निकालकर घर के कार्य पूर्ण करती हो
फिर भी सदा हँसती रहती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

अब तुम काम पर भी जाती हो
घर की जिम्मेदारी भी साथ निभाती हो
सब के लिए दूत बनकर आती हो
फिर भी तुम कभी नहीं थकती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

बच्चों को बड़ा जब कर लेती हो
वो सुने ना सुने, तुम उनकी सदा सुनती हो
बिन कहे भी सारे परिवार का दर्द समझती हो
अपने आँचल की छाँव में सबको सलामत रखती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

हर पल सबके आगे पीछे रहती हो
अपने लिए तुम कब जीती हो
परिवार के लिए अपनी जान छिड़कती हो
पर खुद पर कभी अभिमान नहीं करती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

ममता और करुणा की मूर्त हो
तुम दिल से भी कितनी ख़ूबसूरत हो
फिर क्यूँ अपना ध्यान नहीं रखती हो
अपनी अहमियत आप नहीं समझती हो
व्यर्थ सबकी चिंता करती रहती हो
कभी कोई शिकायत भी नहीं करती हो
माँ! तुम ये सब कैसे कर लेती हो!

अलका डांगी