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Thursday, June 3, 2021

झूठ की जिंदगी!

झूठ की जिंदगी जीते जीते 
आदमी अपनी असली पहचान खो रहा है
हर तरफ अपने अहं की संतुष्टि के लिए  
आडंबर और दिखावा हो रहा है 

हकीकत से वाकिफ़ है फिर भी 
जीवन से आँख मिचौली खेल रहा है 
झूठी शान, झूठी सान्त्वना, झूठी प्रशंसा 
खुश हो रहा है या अपने आप को धोखा दे रहा है 

समय के साथ भागते-भागते 
व्यर्थ चिंता और ग़मों का बोझ ढ़ो रहा है 
सब कुछ अपने भीतर है फिर भी 
बाहरी दुनिया में अपने अस्तित्व को खोज रहा है 

सच्चाई को स्वीकार कर अपनाएगा जिस दिन 
जागृत हो उठेगा वो आत्मबल और आत्मविश्वास जो सो रहा है 
झूठ के सहारे की जरूरत ही नहीं है उसे 
जो दिल ईश्वर की श्रद्धा और सच्चे धर्म में आत्मसात हो रहा है 

अलका डांगी 

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