वैवाहिक जीवन में भी खूब उतार-चढ़ाव आए | सासु इतनी तेज तर्रार थी कि पूरे घर का काम कराकर अंत में बचा-खुचा और झूठन ही देती थी | मार-पीट करना और दैनिक प्रताड़ना तो जैसे हर दिन की समान्य बात थी | बाई सबसे बड़ी थी इसलिए अपने चार देवर की देखभाल और बड़ा करने की जिम्मेदारी भी बहुत अच्छे से निभाई | यह बात और है कि अब वे भी उसे नहीं पूछते और ना ही उसके त्याग और समर्पण की क़दर करते |
जब उसके पति ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया तो औरों की क्या बात | उसका पति भी दो तीन बच्चे पैदा कर दूसरी औरत के यहाँ रहने चला गया और जब कभी आता तो मारपीट और गाली-गलौच कर वापस चला जाता | अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ कर घर बैठ गया और थोड़े दिनों में शराब की लत ने उसका जीवन ही समाप्त कर दिया ||अब खाने पीने और बच्चों के पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई और फिर सावित्री बाई ने घर घर जाकर बर्तन और झाड़ू पोछा का काम शुरू किया बच्चों का पालन-पोषण कर बड़ा किया |
छोटा बेटा पोलियो की वज़ह से अपंग था तो कुछ काम नहीं करता था और बड़ा बेटा होशियार था पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पर लग गया किन्तु शादी के बाद अपनी माँ से जिद्द कर पैसा लेकर दूसरा घर बसा कर वहाँ रहने चला गया और अपनी दुनिया में मस्त हो गया | किस्मत का खेल भी निराला है, बेटी की शादी बहुत अच्छे घर में हुई पर कुछ सालों में उसका पति भी दो छोटे छोटे बच्चों को छोड़ चल बसा और अब वह भी अपनी माँ के साथ रहने लगी |
माँ बेटी दोनों दिन - रात मिलकर कमाते और घर चलाते
और बेटा अपंग का रोना रोकर उनके कमाई पर जीता फिर भी गाली गलौज करता और चैन से जीने भी नहीं देता
बड़ा बेटा जरूरत पड़ने पर माँ के पास आता है और माँ की जरूरत पर फोन तक नहीं उठाता |
कोरोना काल में जब सम्पूर्ण बंद था और सभी के काम छूट गए तभी भी सावित्री बाई ने हिम्मत नहीं हारी |
अपनी बेटी के साथ मिलकर घर पर ही खाने की लजीज चीज़ें बनाकर बेचने लगी और जैसे तैसे घर का खर्चा निकालने लगी
जिस वक़्त अच्छे अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी काम बंद होने की शिकायत कर घर बैठ कर रोने लगे और परेशान होने लगे ऐसे वक़्त सावित्री बाई जो बिल्कुल अनपढ़ होते हुए भी कभी अपनी हिम्मत नहीं हारी और अपनी आमदनी का रास्ता स्वयम निकाला और खुद्दार भी इतनी कि कभी सेठ लोगों जिनके वहाँ काम करती थी उनके आगे हाथ तक नहीं फैलाया न ही अपने यहाँ किसी चीज की कमी का दुखड़ा रोया | बस पूरे दिन अपने काम में व्यस्त और मस्त रहती |और आज भी वही दैनिक क्रम है |सुबह शाम घरों में काम करना और शाम से रात घर से लजीज खाना बनाकर अपना छोटा सा ग्रह उद्योग चलाना और फिर रात को चैन से सोना |
धन्य है सावित्री बाई के इस हिम्मत और जज्बे को जो सभी के लिए एक मिसाल है |जहां चाह वहाँ राह यह सावित्री बाई ने साबित कर दिखाया जो आज भी दिन रात एक कर , बिना थके बिना रुके पूरे दिन काम कर अपना घर और परिवार चलाती है | और सभी को जिन्दगी जीने का सलीका सिखाती है |
अलका डांगी
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