इसे हर कोई समझ नहीं पाता है
नए पुराने बंधनों में बंधता जाता है
कर्मों से जुड़ा ऐसा नाता है
ये आत्मा ही हमारा विधाता है l
ज्ञान दर्शन मोहनीय - घाती कर्म कहलाए
वेदननीय नाम गोत्र आयुष्य जिसने सरल बनाए
अरिहंत की शरण वो पा जाता है
मोक्ष के द्वार की तरफ कदम बढ़ाता है
ये आत्मा ही हमारा विधाता है
राग-द्वेष से जो जुड़ता जाता है
क्रोध, मान , माया , लोभ
इन कषाय के भँवर में फंसता चला जाता है
जन्मों जन्म तक सहन कर्ता जाता है
ये आत्मा ही हमारा विधाता है
आठों कर्मों के बंधन से जो मुक्त हो जाता है
जीवन मरण के चक्र से छूटकर सिद्ध गति पा जाता है
कर्म के मर्म को जो समझ जाता है
वही मुक्ति द्वार खोल पाता है
ये आत्मा ही हमारा विधाता है
अलका डांगी