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Sunday, March 21, 2021

कविता

हर कवि की रूह होती है कविता
मन की भावना और कल्पना की छवि होती है कविता
कुछ कहे कुछ अनकहे शब्दों में जान भरती है
और दिल के झरोखों से उड़ान भरती है कविता
कभी प्रेमिका तो कभी बागी बनती है 
अपने तजुर्बे से महान बनती है कविता 
कोई प्यार से अपनाए चाहे कोई ठुकराए
दिलों में फिर भी जवान रहती है कविता 
चाहे भक्ति कहो चाहे कहो इसे शक्ति
अंतर्मन में नित्य चलने वाली कश्ती है कविता
जीवन का सार है, कभी तकरार है, मन की पुकार है, 
हर वक़्त हृदय में जिसके बहती है कविता 

अलका डांगी 

 




Thursday, March 11, 2021

विचार!!




विचारों का क्या है ये तो आते जाते रहते हैं 
कभी अच्छे कभी बुरे, जहन में हलचल मचाते रहते हैं 
सृजनात्मक हो तो अपने साथ सारी सृष्टि का हो जाता है उद्धार 
विनाशक बन जाए तो हो जाता है नष्ट - भ्रष्ट समस्त संसार.! 

इनकी मर्यादा में  ही है सुखी जीवन का सार
कुछ हमारे विचार , कुछ तुम्हारे विचार 
व्यक्त करो, कर लो साझा या लो जीवन में उतार 
इनको सहजो, या लो फिर इन्हें सँवार 
पर जबरन किसी पर थोपते फिरो अपने विचार 
नहीं देता है कोई, किसी को भी ये अधिकार ! 

विचारों में भी शक्ति होती है अपार 
सकारात्मक हो तो जीवन हो जाता साकार 
नकारत्मक कर देता जीना ही दुश्वार 
सोच समझ कर सींचना इन्हें हर बार 
आखिर अपने विचारों की नैया के हम ही तो हैं खैवनहार.!

अलका डांगी 

Friday, March 5, 2021

बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !!

ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया.!! 

जवानी में इसकी बात न मानी 
जिम्मेदारी और भागदौड़ में अपने 
शरीर की कदर न जानी
और समय हाथ से निकल गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया.!! 

इसने तो अपने लिए जीने का समय दिया 
ढलती शाम की रंगीनियत का परिचय दिया 
अपने अधूरे ख्वाब और शौक फिर से अपनाने का ज़ज्बा दिया 
पूरा जीवन तजुर्बे से भर गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया  !! 

योग, प्राणायाम, और ध्यान  लगाकर 
श्वाछोश्वाश की तरफ ध्यान केंद्रित किया 
धर्म, अध्यात्म और समाज सेवा से जुड़कर 
जीवन का मर्म समझ लिया 
समय का खालीपन भरता गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !! 

बच्चों और परिवार के साथ बेफ़िक्र हो 
हर सम्बंध और गहरा किया 
दोस्तों के साथ गपशप और ठहाके लगाकर 
अपने आयुष्य को लंबा किया 
नया ज़माना, नई पीढ़ी, नई सोच के साथ 
जीवन में नए अनुभव भरता गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !! 

हर जीवन का ये अभिन्न अंग है 
आज हमारे तो कल किसीके संग है 
तन पर हमारा बस नहीं तो क्या 
गर हर मन में जीने की उमंग है 
फ़िर जिंदादिल और प्रफुल्लित
 जीवन का हर क्षण हो गया 
ये बुढ़ापा तो यूँ ही बदनाम हो गया !! 


अलका डांगी 



Thursday, March 4, 2021

कर्म वाद

भवों भव के फेरे लगवाता है 
इसे हर कोई समझ नहीं पाता है 
नए पुराने बंधनों में बंधता जाता है
कर्मों से जुड़ा ऐसा नाता है 
ये आत्मा ही हमारा विधाता है l

ज्ञान दर्शन मोहनीय - घाती कर्म कहलाए
वेदननीय नाम गोत्र आयुष्य जिसने सरल बनाए
अरिहंत की शरण वो पा जाता है 
मोक्ष के द्वार की तरफ कदम बढ़ाता है 
ये आत्मा ही हमारा विधाता है 

राग-द्वेष से जो जुड़ता जाता है 
क्रोध, मान , माया , लोभ 
इन कषाय के भँवर में फंसता चला जाता है 
जन्मों जन्म तक सहन कर्ता जाता है 
ये आत्मा ही हमारा विधाता है 

आठों कर्मों के बंधन से जो मुक्त हो जाता है 
 जीवन मरण के चक्र से छूटकर सिद्ध गति पा जाता है 
कर्म के मर्म को जो समझ जाता है 
वही मुक्ति द्वार खोल पाता है 
ये आत्मा ही हमारा  विधाता है 

अलका डांगी 


जीवन की संध्या!!

शर्माजी बहुत ही सीधे सरल, आदर्शों पर चलने वाले नीति वादी व्यक्ति थे। एक छोटे से गाँव से बाहर निकलकर अपनी मेहनत और लगन से खूब पढ़ लिख कर अपने बल बूते एक आदर्श शिक्षक बने और परिवार का गौरव बढ़ाया l पूरी जिंदगी में उन्होंने अपने उसूलों और अनुशासन से एक अलग मकाम हासिल किया l

अपने शिक्षण काल में अपने विद्यालय और अपने कार्यक्षेत्र की दिलों जान से  निःस्वार्थ भाव से सेवा की और उनकी प्रगति में पूरा योगदान दिया l उनकी ईमानदारी और शिक्षा के प्रति उनके इस योगदान के लिए उन्हें सरकार की तरफ से सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ l घर परिवार और दोस्तों के लिए भी सदा खुशी खुशी हर वक़्त सबकी मदद के लिये तैयार रहते थे और  सभी में खूब इज्ज़त कमाई l परन्तु इस दरमियान कभी भी उन्होंने कोई शौक पूरा नहीं किया न ही घर परिवार और अपने कार्य (शिक्षण) के अलावा कुछ और सोचा भी l धीरे धीरे जब वे रिटायर्मेंट की कगार पर पहुंचे तो अपने आपको खाली महसूस करने लगे l अब उन्हें अपनी चिंता और अपने परिवार की चिंता सताने लगी l ऐसा नहीं था कि वे पैसे से समृद्ध नहीं थे, उनके पास पूर्वजो की जमीन जायदाद और अपनी जिंदगी भर की मेहनत का अपार धन भी था जिससे वे अपनी पूरी जिंदगी खुशी से बैठ कर निकाल सकते थे l पर  अत्यधिक सोच और चिंता के कारण उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि वे धीरे-धीरे हर काम के लिए दूसरों पर आश्रित होते गए और अपना आत्मविश्वास और मनोबल खोने लगे | ऊपर से स्वस्थ दिखते पर आत्मा सदा परेशान रहने लगी |
जब आदमी अपने फैसले खुद न लेकर दूसरों पर आश्रित होता जाता है तब वह धीरे-धीरे अपने आपको पंगु बना रहा होता है l पूरी जिंदगी मेहनत और लगन से हासिल किया हुआ पैसा अब उन्हें अखरने लगा l अपनी नकारत्मक सोच और बुढ़ापे की चिंता धीरे-धीरे जहर बनकर उनके शरीर में फैल गई और अलग अलग बीमारियों ने उन्हें जकड़ लिया l अब वे चाहकर भी अपने आप को इस भँवर से बाहर नहीं निकाल पा रहे थे अपनी जिंदगी का हर क्षण चिंता में गुजारने लगे |

ऐसा नहीं कि हर व्यक्ति की हालत बुढ़ापे में ऐसी ही होती है!!

बहुत से बुजुर्ग अपनी शेष जिंदगी अपने पुराने शौक पूरा करने या फिर नया शौक पालकर उसमें खुश रहते हैं l कोई समाजसेवा तो कोई धर्म ध्यान और अध्यात्म में अपने आपको समर्पित कर देते हैं और जीवन को जैसा है उसे अपनाकर जीवन सफ़ल करने की कोशिश करते हैं l
इसमें भी अलग अलग पहलू होते हैं, किसी आदमी के पास बुढ़ापे में अपना जीवन व्यतित करने जितना धन होता है और शरीर से भी स्वस्थ रहता है और परिवार वालों का प्रेम और सहयोग होता है तो वह अपनी मर्जी से जीता है और दूसरों पर शारीरिक और आर्थिक रूप से आश्रित नहीं होता इसलिए खुश भी रहता है l कोई आदमी बुढ़ापे में इतना सक्षम नहीं होता पैसे और शरीर से परंतु फिर भी सबका प्रेम और सहयोग प्राप्त हो तो परिवार वालों के हिसाब से ढल जाता है और उसी मे संतुष्ट हो जाता है l कोई इंसान आर्थिक और शारीरिक रूप से भी थोड़ा कमजोर होता है और परिवार में भी आपसी क्लेश एवं कलह तथा मनमुटाव चलता है तो उसे दिन रात तानों का सामना करना पड़ता है और मन मारकर चुपचाप सब कुछ सहन करते हुए जीवन का यह पड़ाव जैसे-तैसे गुजारना पड़ता है | और कोई शर्माजी की तरह होते हैं जो सब कुछ होते हुए भी अपनी जिंदगी डर और चिंता में व्यतित करते हैं और सदा दूसरों को खुश रखने और किसीका दिल नहीं दुखे इस सोच में अपने आपको दुखी करते रहते हैं l उनके अंदर एक अनजाना भय रहता है कि अब आखिरी वक़्त में उनका और उनकी पत्नी का क्या होगा, कौन बुढ़ापे में उनकी सेवा करेगा? वे किसी पर आश्रित होना भी नहीं चाहते परन्तु उन्हें ये भी नहीं पता पडता है कि वो  अनजाने में इतना ज्यादा आश्रित हो चुके होते हैं कि अब वे चाहकर भी अपना निर्णय नहीं ले पाते और अपनों की इजाजत के बिना कुछ भी करने में अपने आप को सक्षम नहीं समझते हैं और एक लाचार जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं 
-कहीँ कहीं अपनी इस हालत का जिम्मेदार किसी हद्द तक इंसान खुद भी होता है क्योंकि व्यर्थ की चिंता करते-करते बुढ़ापे तक पहुँचते पहुँचते अपने आज और भविष्य दोनों का कंट्रोल अनजाने में किसी और के हाथों में खुद ही देते है और अपनी शेष जिन्दगी दुखी होकर व्यतित करने के लिए मजबूर हो जाते है l 

ऐसे वक़्त में परिवार वालों का प्यार और सहयोग ही उन्हें हिम्मत और खुशियाँ दे सकता है बशर्ते परिवार के सदस्य उनकी इस हालत और परिवर्तन को समझे स्वीकार करें और उन्हें इस परिस्थिति से बाहर निकालने का प्रयत्न करें | कहते है बच्चे और बुजुर्ग दोनों को संभालना लगभग समान होता है |दोनों को ही प्यार विश्वास और सुरक्षा का सहारा चाहिए होता है तभी वे खुश और निश्चिन्त होकर जीते हैं |और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है 

यह बहुत ही दुखदायी परंतु सच्ची हकीकत है जिसे हर कोई समझ नहीं सकता और शायद स्वीकार भी नहीं कर सकता कि कैसे एक व्यक्ति जिसने अपने जीवन की सुबह बहुत ही हंसते- खेलते आराम से गुजारी वो जीवन की संध्या में पहुँचते पहुँचते दुःख दर्द  और मानसिक पीड़ा  और  परिवार की तकलीफ़ों से परेशान होकर इस जीवन को  चुपचाप अलविदा कर के  एक दिन अचानक चले जाते हैं |

अलका डांगी 

Friday, January 29, 2021

अपने फैसले. !

अपने फैसले स्वयं लोगे
तभी दूसरों पर निर्भर कम रहोगे 
जब अपने आप को समझोगे
तो जीवन में तरक्की भी करोगे 

सलाह - मशवरा ले भी लोगे 
फिर भी अंतिम निर्णय तो स्वत: करोगे 
खुद पर विश्वास रखोगे 
तो सही दिशा भी चुन लोगे 

गलती करोगे तो स्वीकार करने का हौसला भी रखोगे 
दूसरों को दोष देकर अपनी कमियों को तो नहीं ढंकोगे
हारोगे - जीतोगे, जब गिरोगे तब उठना भी सीख लोगे 
फिर से एक नयी शुरुवात तो करोगे 

मुश्किल घड़ी में किसी के आसरे तो नहीं रहोगे 
तब ही अपने किए फैसलों पर सदा नाज़ करोगे 
अपने जीवन में हर पल  संतुष्ट रहोगे 
तब ही दूसरों के जीवन में भी खुशियों के रंग भर सकोगे! 

अलका डांगी 





Sunday, January 10, 2021

मानसिक स्वास्थ्य - समय की जरूरत

' अवसाद ' (depression) और  'चिंता और घबराहट और तनाव' (anxiety) ये शब्द शायद आज भी कई लोगों के लिए अनजाने होंगें और हो सकता है कई इससे वाकिफ भी हो सकते हैं, शायद कभी किसी अखबार में पढ़ा हो या किसी के मुँह से सुना हो या किसी अपने को इस परिस्थिति से गुजरते देखा हो 
पर बहुत कम लोग ही ये जानते और मानते होंगे कि यह सब एक मानसिक बीमारी का प्रकार है |
जो व्यक्ती इस बीमारी का शिकार होता है वह बाहर से एक स्वस्थ और साधारण इंसान की तरह ही लगता है, परन्तु उसके आंतरिक मन और मस्तिष्क में एक अजीब सी घबराहट और खलबली चल रही होती है जिसे वह महसूस तो करता है पर किसी अन्य को समझा और बता नहीं सकता |इसे सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक ही समझ सकता है या फिर वह व्यक्ति जो इस दौर से गुजर चुका है वही इसे बेहतर समझ सकते हैं | 

हमारे भारतीय समाज और परिवार में इसका जिक्र करना भी एक बहुत ही गंभीर परिस्थिति उतपन्न कर देता है, अव्वल तो वे इसे बीमारी मानकर इसका इलाज कराने से कतराते हैं और जो व्यक्ति इस दौर से गुजर रहा है उसे और उसके स्वभाव को दोषी करार कर उसे अपने आप को बदलने के लिए सलाह मशवरा देने लगते हैं और कभी कभी तो लोगों के डर और समाज की शर्म उन्हें इसे स्वीकार करने से रोकती है  |जब कि इससे पीड़ित इन्सान स्वयं नहीं समझ पाता कि उसके साथ ऐसा क्यों और क्या हो रहा है, कभी-कभी तो उनके मन की चिंता, घबराहट और कशमकश इस हद्द तक बढ़ जाती है कि उसे अपना जीना भी निरर्थक लगने लगता है और अपनों को परेशान करने की अपेक्षा उसे अपना जीवन का अन्त करना बेहतर लगता है | इस आत्मग्लानि और कुंठाग्रस्त विचारों से वह असहाय और मजबूर होकर कुछ भी गलत कदम उठा सकता है |


समय आ गया है कि हम इन मानसिक बीमारियों को अपने पूर्वाग्रह और मापदंड में तोलने की अपेक्षा उन्हें समझने का प्रयत्न करें तथा उसे स्वीकार कर जल्द से जल्द उसका निवारण करें | आज जब पूरी दुनिया में छोटे बच्चों, जवानों और बुजुर्गों तक हर कोई इसका शिकार हो रहा है ऐसे वक़्त हम उन्हें अपना प्यार और हौसला देकर, इसका सही समय पर उचित इलाज करवा कर उन्हें इस भँवर से बाहर निकालने में उनकी मदद करें और उनकी जिंदगी  फिर से खुशियों से भर दें |

 अलका डांगी