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Tuesday, June 8, 2021

सावित्री बाई,!

सावित्री बाई की शादी छोटी सी उम्र में हो गई और ब्याह कर वह अपने छोटे से गाँव को छोड़ कर मुंबई शहर आ गई | खेत-खलिहान और गाँव की गलियों में स्वतंत्र घुमने वाली एक अल्हड लड़की शहर की संकरी गलियों के बीच एक छोटी सी खोली (झोंपडी) में जैसे कैद होकर रह गई | अपना बचपना भूलकर अचानक वयस्कों की जिम्मेदारी निभाने लगी |

वैवाहिक जीवन में भी खूब उतार-चढ़ाव आए | सासु इतनी तेज तर्रार थी कि पूरे घर का काम कराकर अंत में बचा-खुचा और झूठन ही देती थी | मार-पीट करना और दैनिक प्रताड़ना तो जैसे हर दिन की समान्य बात थी | बाई सबसे बड़ी थी इसलिए अपने चार देवर की देखभाल और बड़ा करने की जिम्मेदारी भी बहुत अच्छे से निभाई  | यह बात और है कि अब वे भी उसे नहीं पूछते और ना ही उसके त्याग और समर्पण की क़दर करते |
जब  उसके पति ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया तो औरों की क्या बात |   उसका पति भी दो तीन बच्चे पैदा कर दूसरी औरत के यहाँ रहने चला गया और जब कभी आता तो मारपीट और गाली-गलौच कर वापस चला जाता | अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ कर घर बैठ गया और थोड़े दिनों में शराब की लत ने उसका जीवन ही समाप्त कर दिया ||अब खाने पीने और बच्चों के पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई और फिर  सावित्री बाई ने घर घर जाकर बर्तन और झाड़ू पोछा का काम शुरू किया बच्चों का पालन-पोषण कर बड़ा किया |
छोटा बेटा पोलियो की वज़ह से अपंग था तो कुछ काम नहीं करता था और बड़ा बेटा होशियार था पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पर लग गया किन्तु शादी के बाद अपनी माँ से जिद्द कर पैसा लेकर दूसरा घर बसा कर वहाँ रहने चला गया और अपनी दुनिया में मस्त हो गया | किस्मत का खेल भी निराला है, बेटी की शादी बहुत अच्छे घर में हुई पर कुछ सालों में उसका पति भी दो  छोटे छोटे बच्चों को छोड़ चल बसा और अब वह भी अपनी माँ के साथ रहने लगी |
माँ बेटी दोनों दिन - रात मिलकर कमाते और घर चलाते
और बेटा अपंग का रोना रोकर उनके कमाई पर जीता फिर भी गाली गलौज करता और चैन से जीने भी नहीं देता 
बड़ा बेटा जरूरत पड़ने पर माँ के पास आता है और माँ की जरूरत पर फोन तक नहीं उठाता |
कोरोना काल में जब सम्पूर्ण बंद था और सभी के काम छूट गए तभी भी सावित्री बाई ने हिम्मत नहीं हारी |
अपनी बेटी के साथ मिलकर घर पर ही खाने की लजीज चीज़ें बनाकर बेचने लगी और जैसे तैसे घर का खर्चा निकालने लगी
जिस वक़्त अच्छे अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी काम बंद होने की शिकायत कर घर बैठ कर रोने लगे और परेशान होने लगे ऐसे वक़्त सावित्री बाई जो बिल्कुल अनपढ़ होते हुए भी कभी अपनी हिम्मत नहीं हारी और अपनी आमदनी का रास्ता स्वयम निकाला और खुद्दार भी इतनी कि कभी सेठ लोगों जिनके वहाँ काम करती थी उनके आगे हाथ तक नहीं फैलाया न ही अपने यहाँ किसी चीज की कमी का दुखड़ा रोया | बस पूरे दिन अपने काम में व्यस्त और मस्त रहती |और आज भी वही दैनिक क्रम है |सुबह शाम  घरों में काम करना और शाम से रात घर से लजीज खाना बनाकर अपना छोटा सा ग्रह उद्योग चलाना और फिर रात को चैन से सोना |

धन्य है सावित्री बाई के इस हिम्मत और जज्बे को जो सभी के लिए एक मिसाल है |जहां चाह वहाँ राह यह सावित्री बाई ने साबित कर दिखाया जो आज भी दिन रात एक कर ,  बिना थके बिना रुके पूरे दिन काम कर अपना घर और परिवार चलाती है | और सभी को जिन्दगी जीने का सलीका सिखाती है  |

अलका डांगी 

Thursday, June 3, 2021

झूठ की जिंदगी!

झूठ की जिंदगी जीते जीते 
आदमी अपनी असली पहचान खो रहा है
हर तरफ अपने अहं की संतुष्टि के लिए  
आडंबर और दिखावा हो रहा है 

हकीकत से वाकिफ़ है फिर भी 
जीवन से आँख मिचौली खेल रहा है 
झूठी शान, झूठी सान्त्वना, झूठी प्रशंसा 
खुश हो रहा है या अपने आप को धोखा दे रहा है 

समय के साथ भागते-भागते 
व्यर्थ चिंता और ग़मों का बोझ ढ़ो रहा है 
सब कुछ अपने भीतर है फिर भी 
बाहरी दुनिया में अपने अस्तित्व को खोज रहा है 

सच्चाई को स्वीकार कर अपनाएगा जिस दिन 
जागृत हो उठेगा वो आत्मबल और आत्मविश्वास जो सो रहा है 
झूठ के सहारे की जरूरत ही नहीं है उसे 
जो दिल ईश्वर की श्रद्धा और सच्चे धर्म में आत्मसात हो रहा है 

अलका डांगी 

Thursday, May 20, 2021

किरदार.!

कभी हालात को दोष देते हैं
कभी ज़ज्बात में बहते हैं 
अपनी कमियाँ नजरअंदाज करते हैं 
औरों का  बराबर हिसाब - किताब रखते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं.! 

कभी अकेलेपन और  तन्हाई की शिकायत करते हैं 
कभी संयुक्त और संगठन में रहकर भी एकान्त में जीते हैं
वक़्त की कदर न कर बेहिसाब बर्बाद करते हैं 
और समय की कमी की बात करते हैं
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं.! 

मन - मुताबिक हो तो मुस्कराते रहते हैं
नहीं तो ग़म और उदासी के साये में जीते हैं 
जीवन - दर्शन और ज्ञान बाँटते फिरते हैं 
अपना जीवन चिंता और अपूर्ण के एहसास में व्यतित करते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं ! 

ये अंदर कुछ बाहर कुछ होते हैं 
जीवन - भर चेहरों पर अनगिनत मुखौटे पहनते हैं 
कभी खुद भी इन सब से अनजान होते हैं 
कभी जान बुझ कर सब के लिए ज़िम्मेदार होते हैं 
ये हम हैं और हमारे इर्द-गिर्द भी ऐसे कई प्रकार होते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं ! 

अलका डांगी 

Thursday, May 6, 2021

अंधेरे में रोशनी !!




है ये जिन्दगी का इम्तिहान
हर हाल में जीत कर दिखायेंगे
माना कि ये जंग नहीं आसान फिर भी 
सब्र और संयम की ढाल अपनाकर 
हर हालात पर काबु पाएँगे 

एक - दूसरे का रखते हुए ध्यान 
मदद के हाथ भी आगे बढ़ायेंगे 
एकता की देते हुए पहचान 
अपने - पराये, हर रिश्तों को और भी मजबुत बनाएँगे 

नतीजों से हो भले सब अनजान 
अपने प्रयत्नों में कमी नहीं लाएँगे 
किसी के जीवन में भरेंगे मुस्कान 
किसी की चिंता और मायूसी दूर भगाएंगे 

अग्रणी कार्यकर्ताओं को देते हुए सम्मान 
हौसले उनके और बढ़ाएंगे 
दूर हो जाएगी जीवन की ये थकान 
अगर किसी का जीवन हम उज्जवल कर पाएँगे


ईश्वर का है अगर ये फरमान 
अंधेरे में रोशनी भी वो ही दिखाएंगे 
हर दिल का पूरा होगा अरमान
नई आस के साथ फिर चैन और सुकून की जिंदगी बिताएंगे

अलका डांगी

Monday, May 3, 2021

बदलना जरूरी है.!!

समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

देश और समाज की उन्नति के लिए 
हर राह पर अनवरत प्रगति के लिए 
नई तकनीक नई सोच में ढलना जरूरी है 
समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

हर एक पीढ़ी के नजरियों को तवज्जो देने के लिए
किसी के ज़ज्बात और हालात के पीछे की वज़ह समझने के लिए
रिश्तों की गरिमा और नजाकत बरकरार रखने के लिए 
उम्र के हर मोड़ पर साथ चलना जरूरी है
समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

अपनी मेहनत और मशक्कत से हासिल सफलता कायम रखने के लिए 
मुश्किल घड़ी में संभलने और आगे बढ़ने के लिए 
कभी अपने तो कभी अपनों का भविष्य उज्ज्वल करने के लिए 
त्याग और समर्पण भी जरूरी है 
समय के साथ बदलना जरूरी है ! 

मानव जन्म को सफल और सार्थक बनाने के लिए 
जरूरत मन्द को मदद का हाथ बढ़ाने और सहारा बनने के लिए 
दूसरों के जीवन में खुशियाँ और बहार भरने के लिए 
करुणा-वात्सल्य से भरा सरल मन होना जरूरी है
समय के साथ बदलना जरूरी है.! 

अलका डांगी 





Wednesday, March 31, 2021

इन्सानियत ही व्यक्ति की पहचान!!

धरती पर जब जन्म लेता है इंसान
इन्सानियत ही होती है व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान

तुम रंग - रूप और कद - काठी निहारते हो
गोरे - काले, ऊँचे - नीचे, मोटे - पतले का भेद जता
हीन भावना का एहसास दिलाते हो
जो ईश्वर की देन है उसकी हँसी उड़ाते हो
एक अच्छे - भले, सीधे - सरल इंसान का आत्मविश्वास डगमगाते हो
आखिर क्यूँ नहीं दे सकते हम सभी को एक जैसा सम्मान 
इन्सानियत ही तो होती है व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान 

किसी के सपनों की उड़ान भरने से पहले ही उसके पर काट, 
अपने अहं की संतुष्टि और अभिमान का झंडा लहराते हो 
किसी की मंजिल की राह में रूकावट डाल अपनी कामयाबी का जश्न मनाते हो 
राजनीति के दाँव पेंच खेल अपनी हुकूमत चलाने की खातिर 
किसी को नीचा दिखा उसका अस्तित्व मिटाते हो 
धर्म, रूढी और परंपरा के नाम से दंगा - फसाद फैला 
इंसान को इंसान से लड़वाकर आतंक बढ़ाते हो 
आखिर क्यूँ नहीं हम मुसीबत और जरूरत में 
इक - दूजे का सहारा बन अडिग रहें मील के पत्थर के समान 
इन्सानियत ही तो होती है व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान 
 
क्यूँ रहते हैं हम जानकर भी अपने ज़मीर से अनजान.!! 
कब तक देना पड़ेगा हर मोड़ पर इन्सानियत का इम्तिहान!! 
कब तक देते रहेंगे मासूम और निर्दोष अपनी जान!! 
क्या इन्सानियत से बढ़कर है किसी की आन-बान-शान 
कब समझेंगें कि इन्सानियत ही है व्यक्ति की असली पहचान!! 

अलका डांगी 


Monday, March 22, 2021

परिवार

आपसी समन्वय परिवार की शान है
छोटे - बड़े, जहाँ करते सभी इक - दूजे का सम्मान है
बड़ों का बड़प्पन, छोटों का मस्त-मौलापन 
हर दिल के अरमान रखता जवान है
सलाह - मशवरा और परामर्श से
मिल जाता हर मुश्किल का समाधान है 
सुख - दुख में साथ खड़े होकर 
मिट जाती जीवन की थकान है 
बुजुर्गों का तजुर्बा, जवाँ दिलों का नजरिया 
मिलकर बना देते हर कार्य आसान है 
आपसी टकराव हो या हो मनमुटाव 
फिर भी सदा रखते एक - दूसरे का ध्यान है 
इसके जैसा जीवन में है नहीं कोई बन्धन 
परिवार से जुड़कर ही बनती सबकी पहचान है |

अलका डांगी