मुफ्त में, सर्वत्र मिला तो किसीने कदर न जानी
कटौती होने पर सबने भौंहे तानी
फिर भी करते रहे अपनी मनमानी
इसके संरक्षण की किसीने न ठानी
शहरों की सुख-सुविधाओं में ये बेहिसाब बह रहा है
और मिलों दूर कहीं गाँव खेड़ा में कोई एक बूँद पानी को तरस रहा है
मॉल और ऊँची इमारतों में पानी बिक रहा है
और कोई मजबूर - बेबस परिवार नित्य दिन एक गागर पानी के लिए संघर्ष कर रहा है
आधुनिक जीवन शैली और लापरवाही में पानी की कीमत हम भूल गए हैं
तभी मुफ्त प्याऊ की जगह पानी के बाजार खुल गए हैं
नदियाँ, तालाब सुख गए हैं, कुएँ गहरे नाम के रह गए हैं
हैंड पम्प चलाते चलाते कंधे दुःख गए हैं
धरती की गोदी खोदने में पानी के ठेकेदार जुट गए हैं
अब भी समय है सम्भल जाना हे मानव!
प्रकृति से खिलवाड़ नहीं उसकी रक्षा में ही हमारी प्रगति है
जल जीवन है, ईश्वर की देन है, जिसकी मर्यादा में ही सभी की उन्नति है
बढ़ते हुए प्रदूषण और हमारी बेपरवाही ने की उसकी दुर्गति है
कुदरत की इस अमूल्य धरोहर की रक्षा करना अब हमारी सबसे बड़ी चुनौती है |
अलका डांगी