एक पूरी होते होते दूसरी बन जाती सवाल है
खुश है पर संतुष्ट नहीं, ये कैसा जंजाल है
जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है
कभी अपनी कभी अपनों की जरूरतों का रखता बहुत ख्याल है
बेख़बर फँसता चला जा रहा है, खुद नहीं पता कैसे बुन रहा इच्छाओं का कोई जाल है
इच्छाओं की कोई सीमा नहीं ये तो अनगिनत, अनंतकाल है
जरूरत पूरी होकर भी इच्छाओं के आगे फिर कंगाल है
जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है
जीवन चक्र में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अकाल है
इच्छाओं पर संयम स्व-नियंत्रण की मिसाल है
आत्मनिरीक्षण एवं चिंतन से बदल सकता वो अपने जीवन के लय ताल है
सर्वोच्च सुख कहीं नहीं, निज मन में बहाल है
ये बोध ही अपने आप में कमाल है
फिर जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है |
अलका डांगी