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Saturday, June 19, 2021

दिल की बात

दिल ही दिल में बातें हजार करती हूँ 
लिखकर अपनी भावनाओं का इजहार करती हूँ 
कभी अपनी, कभी गैरों की भावनाओं में इस कदर बहती हूँ 
कि खुशी के नगमें और दर्द ए दिल शब्दों में बयां करती हूँ |

हर पीढ़ी के नजरिए को उनकी दृष्टि से देखने की कोशिश करती हूँ 
जीवन की वास्तविकता के प्रति अपनी समझ पेश करती हूँ 
कभी दिल की बात तो कभी हक़ीक़त दुनिया के सामने रखती हूँ 
शब्दों के तार छू जाए ऐसे दिलों में प्रवेश करती हूँ |

समाज की कुरीतियों और शोषण के खिलाफ 
आवाज उठाने की जुर्रत करती हूँ 
प्रत्यक्ष नहीं, अपने लेखन से सही 
कुछ सकारात्मक बदलाव की मंशा रखती हूँ |

ये प्रकृति की देन है, सरस्वती की कृपा है 
इसकी सदा इज़्ज़त करती हुँ 
कलम की ताकत अनंत है, अटूट है 
इसी विश्वास से लिख रही हूँ और लिखती रहती हूँ |

अलका डांगी 

Tuesday, June 15, 2021

इच्छाओं का जाल. !!

आदमी की इच्छाओं का ये हाल है
एक पूरी होते होते दूसरी बन जाती सवाल है 
खुश  है पर संतुष्ट नहीं, ये कैसा जंजाल है 
जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है 

कभी अपनी कभी अपनों की जरूरतों का रखता बहुत ख्याल है
बेख़बर फँसता चला जा रहा है, खुद नहीं पता कैसे बुन रहा  इच्छाओं का कोई जाल है
इच्छाओं की कोई सीमा नहीं ये तो अनगिनत, अनंतकाल है 
जरूरत  पूरी होकर भी इच्छाओं के आगे फिर कंगाल है 
जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है 

जीवन चक्र में कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अकाल है 
इच्छाओं पर संयम स्व-नियंत्रण की मिसाल है 
आत्मनिरीक्षण एवं चिंतन से बदल सकता वो अपने जीवन के लय ताल है 
सर्वोच्च सुख कहीं नहीं, निज मन में बहाल है 
ये बोध ही अपने आप में कमाल है 
फिर जाने किस खोज में हो रहा बेहाल है |

अलका डांगी 




Friday, June 11, 2021

पानी!

पानी की है अजीब दास्ताँ
मुफ्त में, सर्वत्र मिला तो किसीने कदर न जानी 
कटौती होने पर सबने भौंहे तानी
फिर भी करते रहे अपनी मनमानी 
इसके संरक्षण की किसीने न ठानी 

शहरों की सुख-सुविधाओं में ये बेहिसाब बह रहा है 
और मिलों दूर कहीं गाँव खेड़ा में कोई एक बूँद पानी को तरस रहा है
मॉल और ऊँची इमारतों में पानी बिक रहा है
और कोई मजबूर - बेबस परिवार नित्य दिन एक गागर पानी के लिए संघर्ष कर रहा है 

आधुनिक जीवन शैली और लापरवाही में पानी की कीमत हम भूल गए हैं 
तभी मुफ्त प्याऊ की जगह पानी के बाजार खुल गए हैं 
नदियाँ, तालाब सुख गए हैं, कुएँ गहरे नाम के रह गए हैं 
हैंड पम्प चलाते चलाते कंधे दुःख गए हैं 
धरती की गोदी खोदने में पानी के ठेकेदार जुट गए हैं 

अब भी समय है सम्भल जाना हे मानव! 
प्रकृति से खिलवाड़ नहीं उसकी रक्षा में ही हमारी प्रगति है 
जल जीवन है, ईश्वर की देन है, जिसकी मर्यादा में ही सभी की उन्नति है 
बढ़ते हुए प्रदूषण और हमारी बेपरवाही ने की उसकी दुर्गति है
कुदरत की इस अमूल्य धरोहर की रक्षा करना अब हमारी सबसे बड़ी चुनौती है |

अलका डांगी 







Tuesday, June 8, 2021

सावित्री बाई,!

सावित्री बाई की शादी छोटी सी उम्र में हो गई और ब्याह कर वह अपने छोटे से गाँव को छोड़ कर मुंबई शहर आ गई | खेत-खलिहान और गाँव की गलियों में स्वतंत्र घुमने वाली एक अल्हड लड़की शहर की संकरी गलियों के बीच एक छोटी सी खोली (झोंपडी) में जैसे कैद होकर रह गई | अपना बचपना भूलकर अचानक वयस्कों की जिम्मेदारी निभाने लगी |

वैवाहिक जीवन में भी खूब उतार-चढ़ाव आए | सासु इतनी तेज तर्रार थी कि पूरे घर का काम कराकर अंत में बचा-खुचा और झूठन ही देती थी | मार-पीट करना और दैनिक प्रताड़ना तो जैसे हर दिन की समान्य बात थी | बाई सबसे बड़ी थी इसलिए अपने चार देवर की देखभाल और बड़ा करने की जिम्मेदारी भी बहुत अच्छे से निभाई  | यह बात और है कि अब वे भी उसे नहीं पूछते और ना ही उसके त्याग और समर्पण की क़दर करते |
जब  उसके पति ने भी उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया तो औरों की क्या बात |   उसका पति भी दो तीन बच्चे पैदा कर दूसरी औरत के यहाँ रहने चला गया और जब कभी आता तो मारपीट और गाली-गलौच कर वापस चला जाता | अच्छी खासी सरकारी नौकरी छोड़ कर घर बैठ गया और थोड़े दिनों में शराब की लत ने उसका जीवन ही समाप्त कर दिया ||अब खाने पीने और बच्चों के पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी उसके कंधे पर आ गई और फिर  सावित्री बाई ने घर घर जाकर बर्तन और झाड़ू पोछा का काम शुरू किया बच्चों का पालन-पोषण कर बड़ा किया |
छोटा बेटा पोलियो की वज़ह से अपंग था तो कुछ काम नहीं करता था और बड़ा बेटा होशियार था पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पर लग गया किन्तु शादी के बाद अपनी माँ से जिद्द कर पैसा लेकर दूसरा घर बसा कर वहाँ रहने चला गया और अपनी दुनिया में मस्त हो गया | किस्मत का खेल भी निराला है, बेटी की शादी बहुत अच्छे घर में हुई पर कुछ सालों में उसका पति भी दो  छोटे छोटे बच्चों को छोड़ चल बसा और अब वह भी अपनी माँ के साथ रहने लगी |
माँ बेटी दोनों दिन - रात मिलकर कमाते और घर चलाते
और बेटा अपंग का रोना रोकर उनके कमाई पर जीता फिर भी गाली गलौज करता और चैन से जीने भी नहीं देता 
बड़ा बेटा जरूरत पड़ने पर माँ के पास आता है और माँ की जरूरत पर फोन तक नहीं उठाता |
कोरोना काल में जब सम्पूर्ण बंद था और सभी के काम छूट गए तभी भी सावित्री बाई ने हिम्मत नहीं हारी |
अपनी बेटी के साथ मिलकर घर पर ही खाने की लजीज चीज़ें बनाकर बेचने लगी और जैसे तैसे घर का खर्चा निकालने लगी
जिस वक़्त अच्छे अच्छे पढ़े-लिखे लोग भी काम बंद होने की शिकायत कर घर बैठ कर रोने लगे और परेशान होने लगे ऐसे वक़्त सावित्री बाई जो बिल्कुल अनपढ़ होते हुए भी कभी अपनी हिम्मत नहीं हारी और अपनी आमदनी का रास्ता स्वयम निकाला और खुद्दार भी इतनी कि कभी सेठ लोगों जिनके वहाँ काम करती थी उनके आगे हाथ तक नहीं फैलाया न ही अपने यहाँ किसी चीज की कमी का दुखड़ा रोया | बस पूरे दिन अपने काम में व्यस्त और मस्त रहती |और आज भी वही दैनिक क्रम है |सुबह शाम  घरों में काम करना और शाम से रात घर से लजीज खाना बनाकर अपना छोटा सा ग्रह उद्योग चलाना और फिर रात को चैन से सोना |

धन्य है सावित्री बाई के इस हिम्मत और जज्बे को जो सभी के लिए एक मिसाल है |जहां चाह वहाँ राह यह सावित्री बाई ने साबित कर दिखाया जो आज भी दिन रात एक कर ,  बिना थके बिना रुके पूरे दिन काम कर अपना घर और परिवार चलाती है | और सभी को जिन्दगी जीने का सलीका सिखाती है  |

अलका डांगी 

Thursday, June 3, 2021

झूठ की जिंदगी!

झूठ की जिंदगी जीते जीते 
आदमी अपनी असली पहचान खो रहा है
हर तरफ अपने अहं की संतुष्टि के लिए  
आडंबर और दिखावा हो रहा है 

हकीकत से वाकिफ़ है फिर भी 
जीवन से आँख मिचौली खेल रहा है 
झूठी शान, झूठी सान्त्वना, झूठी प्रशंसा 
खुश हो रहा है या अपने आप को धोखा दे रहा है 

समय के साथ भागते-भागते 
व्यर्थ चिंता और ग़मों का बोझ ढ़ो रहा है 
सब कुछ अपने भीतर है फिर भी 
बाहरी दुनिया में अपने अस्तित्व को खोज रहा है 

सच्चाई को स्वीकार कर अपनाएगा जिस दिन 
जागृत हो उठेगा वो आत्मबल और आत्मविश्वास जो सो रहा है 
झूठ के सहारे की जरूरत ही नहीं है उसे 
जो दिल ईश्वर की श्रद्धा और सच्चे धर्म में आत्मसात हो रहा है 

अलका डांगी 

Thursday, May 20, 2021

किरदार.!

कभी हालात को दोष देते हैं
कभी ज़ज्बात में बहते हैं 
अपनी कमियाँ नजरअंदाज करते हैं 
औरों का  बराबर हिसाब - किताब रखते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं.! 

कभी अकेलेपन और  तन्हाई की शिकायत करते हैं 
कभी संयुक्त और संगठन में रहकर भी एकान्त में जीते हैं
वक़्त की कदर न कर बेहिसाब बर्बाद करते हैं 
और समय की कमी की बात करते हैं
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं.! 

मन - मुताबिक हो तो मुस्कराते रहते हैं
नहीं तो ग़म और उदासी के साये में जीते हैं 
जीवन - दर्शन और ज्ञान बाँटते फिरते हैं 
अपना जीवन चिंता और अपूर्ण के एहसास में व्यतित करते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं ! 

ये अंदर कुछ बाहर कुछ होते हैं 
जीवन - भर चेहरों पर अनगिनत मुखौटे पहनते हैं 
कभी खुद भी इन सब से अनजान होते हैं 
कभी जान बुझ कर सब के लिए ज़िम्मेदार होते हैं 
ये हम हैं और हमारे इर्द-गिर्द भी ऐसे कई प्रकार होते हैं 
ये मानव भी बड़े अजीब किरदार होते हैं ! 

अलका डांगी 

Thursday, May 6, 2021

अंधेरे में रोशनी !!




है ये जिन्दगी का इम्तिहान
हर हाल में जीत कर दिखायेंगे
माना कि ये जंग नहीं आसान फिर भी 
सब्र और संयम की ढाल अपनाकर 
हर हालात पर काबु पाएँगे 

एक - दूसरे का रखते हुए ध्यान 
मदद के हाथ भी आगे बढ़ायेंगे 
एकता की देते हुए पहचान 
अपने - पराये, हर रिश्तों को और भी मजबुत बनाएँगे 

नतीजों से हो भले सब अनजान 
अपने प्रयत्नों में कमी नहीं लाएँगे 
किसी के जीवन में भरेंगे मुस्कान 
किसी की चिंता और मायूसी दूर भगाएंगे 

अग्रणी कार्यकर्ताओं को देते हुए सम्मान 
हौसले उनके और बढ़ाएंगे 
दूर हो जाएगी जीवन की ये थकान 
अगर किसी का जीवन हम उज्जवल कर पाएँगे


ईश्वर का है अगर ये फरमान 
अंधेरे में रोशनी भी वो ही दिखाएंगे 
हर दिल का पूरा होगा अरमान
नई आस के साथ फिर चैन और सुकून की जिंदगी बिताएंगे

अलका डांगी