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Saturday, November 27, 2021

चलो पहले इंसान बन जाते हैं !

चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

मन में भेदभाव की दृष्टि जगाने से पहले 
एक दूसरे के दिल में घृणा बढ़ाने से पहले 
प्रेम और विश्वास की डोर मजबूत बनाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

स्त्री-पुरुष को अलग-अलग तराजू में मापने से पहले 
कौन किससे बेहतर है ये साबित करने से पहले 
दोनों को त्याग और समर्पण का महत्व समझाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

संस्कृति और परंपराओं  के नाम पर आडंबर रचाने से पहले  
आधुनिकता और स्वतंत्रता की खिल्ली उड़ाने से पहले 
विचार और आचरण में ज़रूरी बदलाव लाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

कमजोर और मजबूर का शोषण करने से पहले 
नफरत और विद्रोह की ज्वाला उठने से पहले 
धर्म और ईमान की नींव मजबूत बनाते हैं 
चलो पहले इंसान बन जाते हैं 

अलका डांगी 










"आमची मुंबई "


आमची मुंबई  ! 

किसीकी जन्मभूमि है किसी की कर्म भूमि
किसी ने इसे अपनाया
किसी ने ठुकराया
इसके जैसी जिंदादिल वाली नहीं और कोई 
ये है हमारी अपनी - "आमची मुंबई" 

देश की आर्थिक राजधानी है 
गगनचुम्बी इमारतों और झोपड़पट्टीयों के आपसी सामंजस्य की निशानी है 
अरब सागर जैसे विशाल दिल में समा जाता है हर कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमचीमुंबई" 

दंगों ने इसका दिल बहुत धड़काया 
बॉम्ब विस्फोटों से धरती पर हड़कंप मचाया 
अपने - परायों का भेद दिखाकर खूब डराया 
फिर भी इसकी आत्मा डगमगा न सका कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमची मुंबई" 

कुदरत के प्रलय और कहर से जूझ चुकी है 
बीमारी महामारी से लड़कर फिर ऊपर उठी है 
राजनीति की शिकार होकर भी कभी नहीं झुकी है 
इसकी उन्नती प्रगति से जुड़े कदरदान कई 
ये तो है हमारी अपनी  - "आमची मुंबई "

सिनेजगत से अपनी अलग पहचान बनाई 
उद्योगपतियों ने इसकी शान और बढ़ाई 
हर व्यक्ति के कार्य को महत्ता दिलाई 
चाहे टैक्सी, ठेला या फिर डब्बे वाला क्यूँ न हो कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमची मुंबई" 

मायानगरी कहलाई जाती है इतना इसका आकर्षण 
एक बार देखने की तमन्ना रहती सभी के अंतर्मन 
सिद्धिविनायक और महालक्ष्मी के आशीर्वाद से हर पल निखर जाता यहाँ का जनजीवन 
इसके दरियादिल में बसना चाहता हर कोई 
ये तो है हमारी अपनी - "आमची
मुंबई "

अलका डांगी

Thursday, November 18, 2021

सम्पूर्ण जीवन का सार है जिंदगी !

कभी सवाल तो कभी जवाब है जिंदगी 
अपने ही कर्मों का हिसाब-किताब है जिंदगी 
मानो तो कठिन समझो तो सरल 
दिल से जियो तो बेहिसाब है जिंदगी
हर पन्ना जैसे खुली किताब है जिंदगी 

दिल पर ले लिया तो तनाव है जिंदगी 
हँसते मुस्कराते चल पड़े तो अल्हड,चंचल बहाव है जिंदगी 
थोड़ी उलझी , थोड़ी सुलझी 
बनतीं - बिगड़ती , संवरती - निखरती 
नित नए रंग ढ़ंग बदलती 
उतार-चढाव , धूप-छांव से गुजरती 
जीने की चाह हो तो बेपनाह है जिंदगी 

अपनों का साथ हो तो प्रेम और प्रीत का अंबार है जिंदगी 
ग़म के साये भी है तो खुशियों का संसार है जिंदगी 
कभी हकीकत दर्शाती कभी ख्वाब सजाती 
ख्वाहिशों और तमन्नाओं का भंडार है जिंदगी 
हर पल , हर क्षण की अहमियत समझाती 
सम्पूर्ण जीवन का सार है जिंदगी 

अलका डांगी 










Tuesday, October 26, 2021

कर्त्तव्य बोध

हाँ ! वो बुजुर्ग हैं 
वो ज्येष्ठ नागरिक हैं 
तो क्या हुआ 
वो भी सीने में जवान दिल रखते हैं 
जीवन की रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर हो गई 
पर आज भी हँसने खेलने और मिलने झूलने के लिए उनके दिल उतने ही धड़कते हैं 

हाँ  !  वो सेवा निवृत्त हुए है
तो क्या हुआ 
कहीं और प्रवृत्त हुए हैं 
जिम्मेदारी के बोझ तले दबे हुए कुछ अधुरे ख्वाब, कुछ ख्वाहिशों को पूरा करने की मंशा रखते हैं 
किसी प्रकार अपने आप को व्यस्त रखने की हर संभव कोशिश करते हैं 
स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने की जद्दोजहद करते हैं 

 हाँ ! वो थक गए है 
कंधे थोड़े झुक गए हैं 
तो क्या हुआ 
जीवन भर की कड़ी मेहनत और उतार-चढाव के बाद शान से जीने का हक रखते हैं 
अपने तजुर्बे और मशवरो से सभी का मार्गदर्शन करते हैं 
परिवार और रिश्तों के लिए सब कुछ समर्पण करते हैं 

हाँ   !  वो बीमार है 
हालात से लाचार है 
कभी शिकायत, कभी चिड़चिड़ करते हैं 
तो क्या हुआ 
दो प्रेम के शब्द और कुछ वक़्त अपनों के साथ बिताने के लिए तरसते हैं 
और कहीं किसी पर बोझ न बन जाए 
इसलिए दिन-रात स्वस्थ रहने का भरसक प्रयत्न करते हैं 

हाँ  ! वो हमसे कुछ आशा कुछ उम्मीद रखते हैं 
अपने दुख - दर्द और लाचारी सुनी निगाहों से बयान करते हैं 
 तो चलो हम उनकी जीवन संध्या में प्रेम और विश्वास की रोशनी जगाएं 
उनकी व्यर्थ चिंता और डर के अंधेरे को दूर भगाएँ 
जिस सम्मान और स्वाभिमान से उनका जीवन गुजरा है 
वह यूँ ही कायम बना रहेगा ऐसा यक़ीन दिलाएं 
कि प्रेम और कर्त्तव्य बोध से उनकी हर साँस में शान्ति और सुकून पहुँचाए 

अलका डांगी 









Monday, September 27, 2021

मेरी नन्ही परी

मेरी नन्ही सी परी , देखो कैसी बड़ी हुई जा रही है 
मानो कल की ही बात हो 
रोती  , चीखती, कभी जिद्द पर चढ़ जाती 
जाने कैसे सारी अदाएं ही बदलती जा रही है 

पढ़ाई से थोड़ी कतराती, कभी जी चुराती 
Creativity में कमाल कर जाती 
कभी youtuber बन जाती 
कभी artist बन जलवा दिखती 
इस digital era में सबकी गुरु बन जाती 
नित नए शौक अपनाकर अपनी चंचलता से 
सबके दिलों पर राज करती जा रहीं हैं 
मेरी नन्ही सी परी , देखो कैसे बड़ी होती जा रही है 

दोस्तों की दोस्त, परिवार की जान 
यूँही हँसती खिलखिलाती रहे सदा 
जितनी अच्छी है दिल से 
वैसे ही आगे बढ़ती रहे यही है दिल से दुआ 
अपने हर जन्मदिन के साथ ही नए सपनों और नई उमंगों  को साकार करने जा रही है 
मेरी नन्ही सी परी देखो कैसे बड़ी होती जा रही है |

With lots of love 
   माँ 

 






Saturday, September 25, 2021

बेटी-बेटा !


बेटा - बेटी 

बेटी हो या बेटा  क्यूँ किसी को ज्यादा किसी को कम है आँकना 
दोनों की तुलना कर क्यूँ बसानी किसी के मन में हीन भावना 

दोनों की है अपनी स्वतंत्र पहचान 
अपने अपने सपनों की दोनों  ही भरते उड़ान 
अपने गुणों और क़ाबिलियत से दोनों पाते सम्मान 
दोनों परिवार की जान है और दोनों माता - पिता का है अभिमान

बेटियाँ घर की रौनक है तो बेटे  भी हैं घर की शान 
बेटियाँ गौरव बढ़ाती तो बेटे  भी बढ़ाते है सम्मान 
चंचल चुलबुल होती है बेटियाँ , बिखेरती पूरे घर में अपनी मुस्कान 
बेटों की मस्तियाँ और जिंदादिली जीवन बना देती आसान 
भावुक होकर भावनाओं में बहती है  अगर बेटियाँ 
बेटों में अपनी भावनाओं को छुपाने की कला और होता है व्यवहारिक ज्ञान 

बेटी हो या बेटा दोनों ही स्वस्थ समाज के  हैं आधार 
अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाकर पूरा करते अपना व्यवहार 
कोई नहीं भूलता अपना कर्तव्य और अपने संस्कार 
अपनी संस्कृति और जडों से दोनों को होता है उतना ही प्यार  

उनकी तुलना करके क्यूँ बसानी किसीके भी मन में हीन भावना 
बेटी हो या बेटा क्यूँ किसी को ज्यादा किसी को कम है आँकना

अलका डांगी 








Wednesday, September 15, 2021

चंद लम्हे फुर्सत के !

चंद लम्हे फुर्सत के. !!

एक अरसा हो गया फुर्सत के कुछ पल से रुबरु हुए 
तवज्जो नहीं दी जिसे करीब होते हुए 
जाने कहाँ खो गए वो पल हमसे रूठे हुए 
ढूँढ रही हूँ अब उसे , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

इस कदर अपनी दुनिया में हम मशगूल हुए 
कि बरसों बीत गए अपनी सुध लिए हुए 
फुर्सत के कुछ पल फिर याद आये , जब अपनों की महफ़िल में भी हम तन्हा हुए 
ढूँढ रही हूँ अब उसे , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

इस बार कोई बहाना नहीं , फुर्सत निकालनी है फुर्सत के कुछ पल जीने के लिए 
हर वो द्वार खोलने है जो बंद कर दिए थे अपने लिए
बेफिक्र हो जाना है फुर्सत को जीवन में अपनाते हुए 
कि फुर्सत का हाथ थाम लेना है बिना हिचकिचाते हुए 
सहेज लेना है अब उसे  , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

जरूरी है फुर्सत के कुछ पल भी ,सुचारु जीवन चलाने के लिए 
चंद लम्हें फुर्सत के चाहिए हँसने  , खेलने और अपनी रूचि अपनाने के लिए 
कि अपने लिए भी जीना है  ,जिम्मेदारी सारी निभाते हुए 
अब नजरअंदाज करके नहीं  , 
अंदाज बदल के  फुर्सत को गले लगाना है मुस्कुराते हुए |
सहेज लेना है अब उसे , अनदेखा कर दिया था जिसे राह में चलते हुए |

अलका डांगी