अपने अगर रूठे हो तो उनको मनाना,
अपनों से हम जो रूठे तो मान जाना
गिले - शिकवे छोडकर फिर साथ निभाना
दिन रात की बैचेनी से बाहर आना क्या इतना कठिन है ?
आरोप - प्रत्यारोप को दिलोदिमाग से हटाना
पुरानी रंजिश छोड फिर घुलमिल जाना
नफरत की दीवार हटा,उलझे हुए रिश्तों को सुलझाना
अपनों के साथ मिलकर फिर तीज-त्यौहार मनाना
अंधेरे साए से बाहर निकल आना क्या इतना कठिन है ?
चिंता और समस्याओं का समाधान मिलकर सुलझाना
आपसी बातचीत से शंका संदेह के चक्रव्यूह से बाहर आना
कही सुनी बातों को नजरअंदाज कर अलगाव मिटाना
जो जैसा है उसे वैसा ही अपनाना क्या इतना कठिन है ?
जिंदगी आज है कल का क्या ठिकाना
भूत भविष्य के सागर में बेवजह क्यूँ गोते लगाना
न शिकायत ना पश्चाताप में डूबे हम
जीवन को दे दो ऐसा प्रेम और सरलता का नजराना
संपूर्ण जीवन अकेलेपन के एहसास में क्या बिताना
अहंकार और अभिमान मिटाना क्या इतना कठिन है ?
अलका डांगी