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Thursday, July 31, 2025

दाम्पत्य जीवन


दाम्पत्य जीवन  !!
बेशक अपनी मर्जी के मालिक हैं तुम हम 
स्वतंत्रता और आधुनिकता का हर वक्त भरते रहते हैं दम 
पर दाम्पत्य जीवन की सफलता में साथ चलना पड़ता है मिलाकर कदम से कदम
ना अभिमान की जगह यहाँ पर 
ना स्वाभिमान को रखना दाँव पर 
एक दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान ही 
हर दिन देता है प्रेम को जन्म 
ना पूर्वाग्रह मन में बसा कर 
ना  अपने आग्रह को जिताकर 
सरलता और सहजता से ही 
ये रिश्ता सँवरता है हरदम 
ना आरोप प्रत्यारोप लगा कर 
ना भेदभाव और कमियाँ जताकर 
परिवार में संतुलन बनाकर ही
जीत सकते हैं दिलों को हम 
पैतृक सत्ता और नारीवादी की दुहाई देकर 
फर्ज और कर्तव्य से मुँह मोड़कर 
ये कोई खेल नहीं की तुम जीतो या हम 
आखिर हार तो रिश्तों की ही होगी 
अगर साथ मिलकर ना सुलझा सके हम अपने अहम
कुछ तुम समझो कुछ समझे हम 
एक खूबसूरत रिश्ता बन सकता है 
बस चाहिए साथ मुझको तुम्हारा और तुमको हमारा 
जीवन में चाहे कितने उतार चढाव आए या आए खुशियाँ और गम 

अलका डांगी 







Sunday, July 13, 2025

खास शख्स

मुश्किल वक्त में ऐसा कोई शख्स खास होता है 
जो कि सदा हमारे आसपास होता है 
सोई उम्मीद जग जाती है  
खोई हुई मुस्कुराहट लौट आती है 
जब जब उसके होने का एहसास होता है 
मुश्किल वक्त में ऐसा कोई शख्स खास होता है 
वह हिम्मत बन कर आता है 
आस भरी दवा दे जाता है 
खुशनुमा माहौल कर जाता है 
जब जब मन उदास होता है 
मुश्किल वक्त में ऐसा कोई शख्स खास होता है
निस्वार्थ सेवा और समर्पण सा मित्र होता है 
प्रेम और करुणा से भरा हुआ अद्भुत चित्र होता है
प्रशंसा और श्रेय से कोसों दूर होता है
मानवता से सराबोर , और नहीं कोई उसे सरोकार होता है 
मदद करने के लिए तत्पर बस हर वक्त यही प्रयास होता है 
मुश्किल वक्त में ऐसा कोई शख्स खास होता है |

अलका डांगी 


Wednesday, June 18, 2025

मेरा शहर !

मेरा शहर  !

मेरे शहर का यह कैसा विकास हो रहा है 
ऊंची-ऊंची इमारतों का निर्माण आसपास हो रहा है 
आम आदमी खुली सड़क और खुले मैदान खोज रहा है
हर गली हर नाके पर सिर्फ शोर हो रहा है 
सिर्फ बाहर ही नहीं अब अंतर्मन भी अशान्त हो रहा है 
मेरे शहर का यह कैसा विकास हो रहा है 

यातायात की सुविधा के लिए मेट्रो के फेज बन रहे हैं 
ट्रैफिक से उबरने के लिए ब्रिज पर ब्रिज चढ़ रहे हैं
सुविधा के लिए हर कोई अपनी मुमकिन कोशिश कर रहा है 
फिर भी भीड़ पर नियंत्रण खो रहा है  
मेरे शहर का यह कैसा विकास हो रहा है 

बरसों पुराने हरे-भरे पेड़ कट रहे हैं 
सागर का तट भी कहीं खो रहा है 
आधुनिकता और विज्ञान का चमत्कार हो रहा है 
फिर भी हर कोई धैर्य और संयम की परीक्षा दे रहा है 
मेरे शहर का यह कैसा विकास हो रहा है 

प्रदूषण का स्तर ऊँचाई छू रहा है 
पशु पक्षियों का आवागमन कम हो रहा है 
प्रकृति के साथ नित्य नया खिलवाड़ हो रहा है 
फिर भी ये शहर हँसते हँसते-हँसते बढ़ती जनसंख्या का बोझ ढ़ो रहा है 
मेरे शहर का यह कैसा विकास हो रहा है

अलका डांगी 

Tuesday, April 15, 2025

दीदी कहूँ या छोटी माँ चाहिए कहना 
परिवार का हो तुम ऐसा अमूल्य गहना 
छोटी उम्र बड़ी जिम्मेदारियाँ 
कैसे निभाती गई तुम हमेशा बहना 

सहनशीलता की मूर्त बनकर 
हर चुनौती को मात देकर 
सुख-दुख में अपनों की ढाल बनकर 
सदा अटल खड़ी थी तुम बहना 

सरल मन सीधी बात 
ईमानदारी और सच्चाई का चोला सदा पहना 
अपनी महत्वाकांक्षा और सपने छोड़ 
निःस्वार्थ भाव से कैसे परिवार में तुम ढलती गई बहना 

चिंता और परवाह सब की बराबर 
मन में सबके लिए दया और करुणा 
धर्म और आध्यात्मिक जीवन अपनाकर 
कैसे तप त्याग में समर्पित होती गई तुम बहना 

तुम्हारे पुण्योदय का फूल खिला है 
वर्षीतप का आभूषण जो तुमने झेला 
हर्ष उल्लास की  ये मंगल बेला 
पूरे परिवार का तुम्हारे आँगन में लगा है जैसे मेला
तुम्हारे त्याग और समर्पण की देन कहें इसे 
या भगवान का आशिर्वाद है ये बहना 

हम सब की दुआओं में सदैव रहना 
खुशियाँ कदम चूमे सारे जहाँ की 
हँसता मुस्कराता फलता-फूलता रहे तुम्हारा घर अंगना 
चाहे तप करो या कोई भी कार्य 
प्रगति पथ पर हमेशा आगे बढ़ते रहना 
ओ बहना दीदी कहूँ या छोटी माँ चाहिए कहना 
अपना प्रेम सब पर यूँ ही बनाए रखना 

अलका डांगी 




 



Thursday, April 10, 2025

मेरे  प्रभु महावीर  !

मेरे तन-मन में बसे महावीर 
मेरे रग-रग में  बसे महावीर 
सच्चे धर्म की राह दिखाने वाले 
आत्मा की पहचान कराने वाले 
उपकारी प्रभु के ऋणी हैं 
जिनने प्रकाश देकर दूर किया तिमिर 
अहिंसा का प्रचार बढ़ाने वाले
अनेकांतवाद का रहस्य समझाने वाले
केवलज्ञानी प्रभु ने ज्ञान कराया
कि आत्मा शास्वत और नश्वर है शरीर
अब उनकी वाणी को आत्मसात करना है 
परमात्मा का दर्शन साक्षात करना है 
तन-मन-धन से प्रभु भक्ति में होकर तल्लीन 
धर के संयम और धीर 
मेरे तन-मन में बसे महावीर 
मेरे रग-रग में बसे महावीर 

अलका डांगी 










Tuesday, February 11, 2025

अनदेखा पहलू !!

अनदेखा पहलू. !! 

आदमी होना इतना आसान कहाँ होता है | पुरुषवाद और पैतृक सत्ता की जंजीरों में आदमी इस तरह जकड़ा होता है कि बाहर निकलने की कितनी भी कोशिश करें अपनी छाप मिटा नहीं पाता खासतौर से नारीवादी मानसिकता उसे समझने और स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होती उनकी नजरें हर पल , हर वक्त उन पर घड़ी ही रहती है और अपने पूर्वाग्रहों से अपने  दृष्टिकोण से उन्हें आँकती रहती है |

यह बात सही है की एक समय था जब आदमी औरतों का शोषण करते थे,  हुकुम चलाते थे और उन्हें घर की दहलीज भी पार नहीं करने देते थे और पैतृक सत्ता का दुरुपयोग कर स्त्रियों को अपने अधिकार से वंचित रखते थे और यह भी हकीकत है कि इस मानसिकता से कई आदमी आज भी ग्रसित हैं और औरतों पर अपना अधिकार और हुकुम चलाना अपनी शान समझते हैं और इस सबसे बाहर निकलना भी नहीं चाहते  - चाहे वह पढ़े लिखे शहरी आदमी हो या किसी गाँव या पिछड़े हुए प्रदेश से हो | परंतु इसका खामियाजा एक साधारण आदमी को भी भुगतना पड़ता है जो समय के साथ काफी आगे बढ़ चुका है और अपने आप को और अपनी मानसिकता को बदलने की पूरी कोशिश कर रहा है  | स्त्रियों के सम्मान और उनके हक के लिए उनके साथ खड़े होने की पूरी कोशिश कर रहा है पर फिर भी हर वक़्त हर कदम पर उसे सम्भल कर रहना पड़ता है क्यूँ कि हकीकत में कई औरतें खुद भी पूर्वाग्रह की शिकार होती हैं और अपने नारीवाद का फायदा उठाकर आदमियों का शोषण करती है |जहाँ एक तरफ समानता की बात करती है वहीँ आदमी की स्वतंत्रता को अपने हाथ में लेना चाहती है और अपनी नारीवादी  दृष्टिकोण और सोच के कारण आदमी कितना भी स्वतंत्र विचार का हो और उसे पूर्ण सहयोग करें फिर भी नफरत का शिकार होता है | ऐसे आदमी की मनःस्थिति कोई समझ नहीं पाता ये बड़े दुःख की बात है  |

भारतीय संस्कृति में खास तौर पर आदमी हमेशा एक द्वंद्व में फंसा रहता है घर के बड़े बुजुर्ग उसका घर के कामों में सहयोग करना , बच्चों के पालन-पोषण में मदद करना , घर संभालना ,रसोईघर में काम करना जैसे कई काम जो पहले सिर्फ स्त्रियाँ करती थी अब स्वेच्छा से पुरुष करता भी है तो बड़े बुजुर्ग यह स्वीकार नहीं कर पाते या उनके सहमित्र और परिवार वाले जिनकी मानसिकता आज भी संकीर्ण है वह उनकी हँसी उड़ाते हैं और आदमी समाज के तानों और हँसी का शिकार होता है और मानसिक परेशानियों से गिरा रहता है | 
बहुत से स्त्रियाँ बड़ी मौका परस्त भी होती है आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर वह घर से बाहर रहना चाहती है..ना घर सम्हालना पसंद है  और ना नौकरी करना चाहती है  बस शॉपिंग करना , किटी पार्टी करना और दोस्तों के साथ गपशप करना, चाली चुगली करना, घूमना फिरना इसे ही नारीवादी,  आधुनिकता और स्वतंत्रता का नाम देती है  स्त्रियाँ तो अपना मन हो तो काम कमाई करें नहीं भी करें , करियर बनाएं नहीं भी बनाएं  जो कि आज के ज़माने में नामुमकिन है  , फिर भी उसकी तरफ कोई उंगली नहीं उठा सकता परंतु आदमी पर पूरे घर की जिम्मेदारी , परिवार की जिम्मेदारी और समाज की दृष्टि रहती है वह सपने में भी कुछ नहीं करने और घर बैठने का सोच नहीं सकता  | कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले पुरुषों के कारण स्त्रियों को कोई हक नहीं होता कि हर पुरुष को इस कटघरे में खड़ा कर उसे प्रताड़ित करें और पुरुष की कौम को बदनाम करे  |
स्त्री हो या पुरुष सबसे पहले इंसान होते हैं और दोनों को पूरा हक है कि वह अपना जीवन अपने तरीके से, पुरी स्वतंत्रता के साथ जियें बशर्ते एक दूसरे को भी उतना ही सम्मान दें जितना वो खुद  के लिए अपेक्षा रखते हैं किसी की स्वतंत्रता को  नियंत्रण करने और उस पर हावी होने की कोशिश नहीं करे ना ही एक दूसरे को स्त्रीत्व और पुरुषत्व के नाम से प्रताड़ित  करें | दोनों को एक दूसरे के परिवार का मान सम्मान और समाज में अपनी इज्जत और मर्यादा में रहकर अपना जीवन खुशी से जीना चाहिए और भावी पीढ़ी के लिए भी एक आदर्श मिसाल कायम करनी चाहिए |

अलका डांगी 
    


   

Wednesday, December 18, 2024

चुल्हा !

चूल्हा 

रसोई घर की रंगत है 
अग्नि की संगत है 
जलकर सब की भूख शांत करता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

कभी धीमी तो कभी तेज गति 
जरूरत अनुसार लय-ताल बदलता है 
अन्न के हर निवाले में स्वाद भरता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

वार- त्यौहार , प्रसंग अनुसार सदाबहार मचलता है 
अपनों के गम में शोक व्यक्त कर बुझता है 
फिर दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है 

अमीर गरीब हर घर 
गांव  - शहर ,  प्रकृति वही,  पर रूप बदलकर 
सबको चैन से सुला कर ठंडी आह भरता है 
दिन निकलता है 
हर घर चूल्हा जलता है

अलका डांगी