वो चाय की चुस्की और दोस्तों का साथ
हँसी, ठहाके और गपशप की क्या बात
दिल खोल कर रख देते हैं
ऐसे फुर्सत के पल रोज कहाँ मिलते है
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैँ
आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं
इज्जत, शौहरत खूब कमाई
पैसों से भी की खूब सगाई
अब दोस्तों के साथ चंद लम्हों के लिए तरसते हैं
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैं
आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं
संसार की माया जाल में उलझे रहे
कुछ शब्द रह गए कहे-अनकहे
दोस्तों के सिवाए उन्हे कौन समझते हैं
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैं
आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं
उम्र की दराज पर जब आकर बैठते हैं
एक दूसरे का दर्द कहते और सुनते हैं
सुकून और राहत की साँस तब लेते हैं
ऐसे फुर्सत के पल रोज कहाँ मिलते हैं
चलो उस पल को फिर जिंदा करते हैं
आओ एक बार फिर चाय पर मिलते हैं
अलका डांगी
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