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Sunday, January 10, 2021

मानसिक स्वास्थ्य - समय की जरूरत

' अवसाद ' (depression) और  'चिंता और घबराहट और तनाव' (anxiety) ये शब्द शायद आज भी कई लोगों के लिए अनजाने होंगें और हो सकता है कई इससे वाकिफ भी हो सकते हैं, शायद कभी किसी अखबार में पढ़ा हो या किसी के मुँह से सुना हो या किसी अपने को इस परिस्थिति से गुजरते देखा हो 
पर बहुत कम लोग ही ये जानते और मानते होंगे कि यह सब एक मानसिक बीमारी का प्रकार है |
जो व्यक्ती इस बीमारी का शिकार होता है वह बाहर से एक स्वस्थ और साधारण इंसान की तरह ही लगता है, परन्तु उसके आंतरिक मन और मस्तिष्क में एक अजीब सी घबराहट और खलबली चल रही होती है जिसे वह महसूस तो करता है पर किसी अन्य को समझा और बता नहीं सकता |इसे सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक ही समझ सकता है या फिर वह व्यक्ति जो इस दौर से गुजर चुका है वही इसे बेहतर समझ सकते हैं | 

हमारे भारतीय समाज और परिवार में इसका जिक्र करना भी एक बहुत ही गंभीर परिस्थिति उतपन्न कर देता है, अव्वल तो वे इसे बीमारी मानकर इसका इलाज कराने से कतराते हैं और जो व्यक्ति इस दौर से गुजर रहा है उसे और उसके स्वभाव को दोषी करार कर उसे अपने आप को बदलने के लिए सलाह मशवरा देने लगते हैं और कभी कभी तो लोगों के डर और समाज की शर्म उन्हें इसे स्वीकार करने से रोकती है  |जब कि इससे पीड़ित इन्सान स्वयं नहीं समझ पाता कि उसके साथ ऐसा क्यों और क्या हो रहा है, कभी-कभी तो उनके मन की चिंता, घबराहट और कशमकश इस हद्द तक बढ़ जाती है कि उसे अपना जीना भी निरर्थक लगने लगता है और अपनों को परेशान करने की अपेक्षा उसे अपना जीवन का अन्त करना बेहतर लगता है | इस आत्मग्लानि और कुंठाग्रस्त विचारों से वह असहाय और मजबूर होकर कुछ भी गलत कदम उठा सकता है |


समय आ गया है कि हम इन मानसिक बीमारियों को अपने पूर्वाग्रह और मापदंड में तोलने की अपेक्षा उन्हें समझने का प्रयत्न करें तथा उसे स्वीकार कर जल्द से जल्द उसका निवारण करें | आज जब पूरी दुनिया में छोटे बच्चों, जवानों और बुजुर्गों तक हर कोई इसका शिकार हो रहा है ऐसे वक़्त हम उन्हें अपना प्यार और हौसला देकर, इसका सही समय पर उचित इलाज करवा कर उन्हें इस भँवर से बाहर निकालने में उनकी मदद करें और उनकी जिंदगी  फिर से खुशियों से भर दें |

 अलका डांगी 
 







Wednesday, January 6, 2021

प्रेम!

प्रेम 

प्रेम पूजा है,  प्रेम ही भक्ति है
प्रेम बलिदान है, और प्रेम ही शक्ति है 

 प्रेम मन का सुख है, प्रेम ही मन का चैन
प्रेम किसी का मोहताज नहीं, प्रेम तो है ईश्वर की देन 

प्रेम प्रेरणा है, प्रेम ही समर्पण 
प्रेम की कोई परिभाषा नहीं, प्रेम है नित्य नव - सृजन 

प्रेम का कोई रूप नहीं, प्रेम मन का मीत है 
प्रेम हर दिल में बसता है, प्रेम ही जीवन संगीत है

प्रेम बाँटने से बढ़ता है, प्रेम जीने का सहारा है
प्रेम अपने दिल में बसा दो , फिर हर दिल पर राज तुम्हारा है!! 



 अलका डांगी 

Tuesday, December 15, 2020

आत्मदर्शन

मैंने यहाँ इंसान का हर रूप देखा
कभी बाह्य, कभी आंतरिक, 
बदलता हुआ हर स्वरूप देखा
स्वच्छ, निर्मल नीर सा प्रफुल्लित मन देखा
छल, कपट, माया से लिप्त - आदमी का गिरगिट जैसा बदलता रंग देखा

मेहनत, ईमानदारी और लगन से आसमाँ की ऊँचाइयाँ छूते हुए भी देखा
बेईमानी और चापलूसी के चौले में 
पद -  प्रतिष्ठा का ताज पहनते भी देखा

कहीं सुख - सुविधा और परिवार के साथ रह कर भी 
 इंसान को हर वक़्त अकेला और बीमार देखा
तो कहीं अपनी परवाह न करते हुए दूसरों की मदद और सेवा के लिए सदा तत्पर खड़ा, दिल का अमीर  देखा

किसी को अपनी मर्जी से जीवन जीने का लुत्फ उठाते देखा
किसी को जीवन के हर मोड़ पर शिकायत करते देखा
किसी को औरों की खुशी में खुश होते देखा
किसी को हर पल ईर्ष्या और स्वार्थ की चिता में जलते देखा

ये सब तो है कर्मों का लेखा-जोखा
वर्ना हर दिल में है वास प्रेम, करुणा और वात्सल्य का 
बस आवरण है उन पर सदियों से ज़मी परतों का 
जिस दिन खुल  जाएगा इंसान के दिल का ये झरोखा अनुभव हो जाएगा आत्मदर्शन का 
उस दिन दिखाई देगा वो.. जो कभी किसी ने ना देखा 
वो दर्शन होगा अद्भुत और अनोखा.. 


अलका डांगी

Monday, October 19, 2020

सूरज की पहली किरण

आसमान के पट से निकलती सूरज की पहली किरण
मुस्कराते हुए देती है सब को जैसे नया जीवन 
अद्भुत होता है नित्य दिन ये दर्शन
नया सवेरा, नई आशा, प्रफुल्लित हो उठता हर मन 
अपने आशियाने से बाहर निकल व्यस्त हो जाता जनजीवन 

कहीं प्रभु भक्ति में लीन भक्त करते भजन कीर्तन 
कहीं योगाभ्यास और व्यायाम में ओत प्रोत होते तन बदन 
कहीं हँसता मुस्कराता विद्यालय जाता बचपन 
और कहीं चाय की चुस्की और अखबार में ताजगी ढूंढता मन 
कहीं पक्षियों की चहचहाहट, कहीं घंटियों की टन टन 
कहीं कलियाँ खिल खिलाकर फूल बन , महकाती है उपवन 
अपनी अपनी दिनचर्या में रमता हुआ हर ज़न 

दिन - रात के इस फेरे का सदियों से है चलन 
जैसे हर रात के साये से मुस्कराकर फिर बाहर निकलती सूरज की पहली किरण 
ऊर्जा से भर देती है फिर से सब का जीवन
वैसे ही अंधेरे चिर कर तु भी उजला कर दे सारा चमन खुशियाँ लुटा , दुःख दर्द में किसीका सहारा बन 
नेकी और बदी में करदे अपने आप को अर्पण 
मिट जाएगी जीवन चक्र की सारी थकन 
बनना है तो बन जा सूरज की किरण 
ऊर्जा से भर दे फिर सब का जीवन 


अलका डांगी 















Friday, September 25, 2020

' ना ' कहना सीखो !!

दुर्व्यवहार, दुराचार या हो अत्याचार
मूक रहकर मत करो स्वीकार 
आवाज उठाओ, न घबराओ, चाहे तो चीखो
बस एक बार निडर होकर 'ना' कहना सीखो.!

अजनबी हो या हो कोई रिश्तों से जुड़ा रिश्तेदार 
चुपचाप जुल्म सहन कर लो इतने भी न बनो लाचार ! 
देखा - अनदेखा मत करो, मत सहो, आगे बढ़ो
बस एक बार निडर होकर ' ना.' कहना सीखो ! 

सीमा - मर्यादा की रेखा कर रहा है ग़र कोई पार 
निःसंकोच उठा लो तुम भी अपना हथियार 
बुराई और कपट के खिलाफ लड़ों, मत झुको 
बस एक बार निडर होकर ' ना ' कहना सिखों.! 


अलका डांगी 





Friday, September 11, 2020

अनजाना मर्ज

अपने मापदंड और पूर्वाग्रहों से उसे मत आँकीए
उसकी मनःस्थिति समझने की कोशिश तो कीजिए
सलाह - मशवरा नहीं, उसे प्यार और हौसला दीजिए
वह टूट कर बिखर जाए उससे पहले उसे सम्भाल लीजिए 

न वह तन से बीमार है न मन से 
गुट रहा है वह हर पल अवसाद के अकेलेपन से 
सब साथ है फिर भी नहीं जानता क्यूँ 
घिरा हुआ है चिंता, घबराहट और खालीपन से
समझते हुए भी बेबस है और मजबूर है 
इस अनजाने मर्ज के भँवर की जकड़न से 

इस वक़्त अपना साथ दीजिए और उसका विश्वास जीतीए 
इस भँवर से बाहर निकालने में उसे हिम्मत दीजिए 
ये वक़्त भी गुजर जाएगा बस उसका हाथ थाम लीजिए 
हँसते मुस्कुराते हुए उसकी सुनी बगिया गुलजार कीजिए
टूटे - बिखरे हुए मन को जोड़कर फिर से उसका जीवन सँवार दीजिए 


अलका डांगी 



Thursday, September 10, 2020

क्या ज़रूरी है !!

क्या यहाँ काम करके जताना जरूरी है ! 
कुछ करो या न भी करो पर करने का दिखावा जरूरी है! 
दूसरों के काम को अपना बताकर 
श्रेय खुद ले जाना जरूरी है ! 
और इसी क्रम में दूसरों को नीचा दिखाकर
अपना सिक्का जमाना जरूरी है ! 

क्या यहाँ झूठी चाहत और अपनापन दिखाना जरूरी है ! 
सच्चे दिल से हो न हो पर एहसास दिलाना जरूरी है ! 
भीतर नफरत और कड़वाहट भरी है ! 
फिर भी प्रेम का नकाब चढ़ाना जरूरी है.! 

क्या यहाँ समाज के हर रीति रिवाज निभाना जरूरी है ! 
सही हो या गलत पर आडंबर अपनाना जरूरी है ! 
विद्रोह की आवाज उठे अगर तो 
संस्कारों की दुहाई देकर उसे दबाना जरूरी है ! 

नहीं.... 
क्यूँकी यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो 

दो रूप  नहीं धारण करते हैं 
जैसा मन है वैसा ही आचरण करते हैं 
गलती हो तो निःसंकोच स्वीकार करते हैं 
न किसीकी राह में रुकावट बनते हैं 
न मन में छल कपट की भावना रखते हैं 
भीड़ में न चलकर अपनी राह खुद तय करते हैं 

क्यूँ कि यहाँ सरल और निर्मल मन होना जरूरी है 
बाह्य और अंतर्मन एक होना जरूरी है 
जीवन सिर्फ जीना ही नहीं सफल और सार्थक बनाना जरूरी है 
और इंसान के मन में इन्सानियत होना जरूरी है 

अलका डांगी