पर बहुत कम लोग ही ये जानते और मानते होंगे कि यह सब एक मानसिक बीमारी का प्रकार है |
जो व्यक्ती इस बीमारी का शिकार होता है वह बाहर से एक स्वस्थ और साधारण इंसान की तरह ही लगता है, परन्तु उसके आंतरिक मन और मस्तिष्क में एक अजीब सी घबराहट और खलबली चल रही होती है जिसे वह महसूस तो करता है पर किसी अन्य को समझा और बता नहीं सकता |इसे सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक ही समझ सकता है या फिर वह व्यक्ति जो इस दौर से गुजर चुका है वही इसे बेहतर समझ सकते हैं |
हमारे भारतीय समाज और परिवार में इसका जिक्र करना भी एक बहुत ही गंभीर परिस्थिति उतपन्न कर देता है, अव्वल तो वे इसे बीमारी मानकर इसका इलाज कराने से कतराते हैं और जो व्यक्ति इस दौर से गुजर रहा है उसे और उसके स्वभाव को दोषी करार कर उसे अपने आप को बदलने के लिए सलाह मशवरा देने लगते हैं और कभी कभी तो लोगों के डर और समाज की शर्म उन्हें इसे स्वीकार करने से रोकती है |जब कि इससे पीड़ित इन्सान स्वयं नहीं समझ पाता कि उसके साथ ऐसा क्यों और क्या हो रहा है, कभी-कभी तो उनके मन की चिंता, घबराहट और कशमकश इस हद्द तक बढ़ जाती है कि उसे अपना जीना भी निरर्थक लगने लगता है और अपनों को परेशान करने की अपेक्षा उसे अपना जीवन का अन्त करना बेहतर लगता है | इस आत्मग्लानि और कुंठाग्रस्त विचारों से वह असहाय और मजबूर होकर कुछ भी गलत कदम उठा सकता है |
समय आ गया है कि हम इन मानसिक बीमारियों को अपने पूर्वाग्रह और मापदंड में तोलने की अपेक्षा उन्हें समझने का प्रयत्न करें तथा उसे स्वीकार कर जल्द से जल्द उसका निवारण करें | आज जब पूरी दुनिया में छोटे बच्चों, जवानों और बुजुर्गों तक हर कोई इसका शिकार हो रहा है ऐसे वक़्त हम उन्हें अपना प्यार और हौसला देकर, इसका सही समय पर उचित इलाज करवा कर उन्हें इस भँवर से बाहर निकालने में उनकी मदद करें और उनकी जिंदगी फिर से खुशियों से भर दें |
अलका डांगी