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Wednesday, March 18, 2026

माया ,कपट , राजनीति या सच्चा प्रेम. !!

माया  , कपट,  राजनीति या सच्चा प्रेम  !!

क्या तुमने कभी माया को समझा है
अदृश्य होकर अपना खेल खेलती है 
प्यार और मासूमियत का मुखौटा पहनती है 
अपने स्वार्थ की पराकाष्ठा होती है
दाँव पेंच में ही रचती बसती है 
बड़ी बेगैरत होती है 

क्या तुमने कभी कपट का रूप देखा है 
विश्वासघात का असली झरोखा है
दोगलापन और मक्कारी बेहिसाब है
अपने फरेब को छिपाने के लिए पहनता सदा शालीनता और सच्चाई का नकाब है
जीवन का सबसे बड़ा दाग है 

क्या तुम कभी राजनीति का शिकार हुए हो 
माया कपट से भरी,  शतरंज की चाल से लेस 
ईर्ष्या-जलन , असुरक्षित भावना,  जाने कितने मन में लेकर द्वेष
पद प्रतिष्ठा की चाह में कराती हैं क्लेश 
जिद्द,  जुनून और खोखली बातों की मिसाल है 
ज़मीर पर उठता एक सवाल है 

क्या तुमने कभी सच्चे प्रेम को महसूस किया है 
निःस्वार्थ,  निष्कपट प्यार का सागर 
करुणा और भावनाओं से छलकता गागर
सरल,  सहज,  स्वाभाविक और समझदार
यही है सुखमय जीवन का असली आधार
माया,  कपट और राजनीति के लिए बंद है उसके द्वार 
अंतरात्मा कभी नहीं करती इन्हें स्वीकार 
अपनाना है तो प्रेम को अपनाओ 
यही देगा आत्मिक सुख और होगा जीवन का उद्धार 

अलका डांगी 
 


 


Monday, March 2, 2026

होली के कुछ अलग रंग !

होली के कुछ अलग रंग !!

इस बार होली में द्वेष और ईर्ष्या का दहन करते हैं 
सबके जीवन में प्रेम और वात्सल्य का रंग भरते हैं
 
बढ़ रहा है जो आपसी संबंधों में अन्तर 
उसमें विश्वास के रंग भरकर दूरियाँ कम करते हैं 
रिश्तों की कड़वाहट को नम्रता की मिठास से खत्म करते हैं 

निराशा और हताशा से भरे है जिनके चित्त 
आस्था की किरणों से उत्साह के रंगों की ज्योत करते हैं
नफरत की दीवार को चाहत के रंगों से ओतप्रोत करते हैं 

ये पर्व है खुशियों का,  मिलन का,  बुराई पर अच्छाई की जीत का 
चलो फिर आत्मा को जीत कर हर आत्मा को आत्म विभोर करते हैं 
इस पर्व को आनंद और खुशियों के रंगों से सराबोर करते हैं 

सबके जीवन में प्रेम और वात्सल्य का रंग भरते हैं 
इस बार होली में द्वेष और ईर्ष्या का दहन करते हैं 

अलका डांगी 

 
 

Wednesday, February 25, 2026

परम सत्य. !!


परम सत्य  !

समय भी लेता है कैसी ये करवट 
जिन के लिए करते जीवन भर मशक्कत 
हर वक्त उन्हीं के दिल में रहती अपनों से शिकायत 
ऐसे बेचैन मन की हजारों चाहत 
खुशी सर्वोत्तम , पद उच्चतम , शीघ्र बरकत 
ईर्ष्या , जलन और तुलना में 
कुंठित मन करता रहता सबको आहत 
बेबस लाचार बनकर औरों की नजरों में पाना चाहता इज्जत 
राजनीति के दाँव -पेंच से करना चाहता हुकूमत 
अच्छे - बुरे का भान नहीं, कर रहा कैसी हरकत 
अपना स्वार्थ सद्धता जहाँ , करता रहा सदा वहीं खिदमत 
दो रूप , दो रंग , दोगलापन - आखिर कहाँ तक 
आधा सच,  आधा झूठ , माया - कपट 
खोखली बातों का कर रहा सिर्फ जमघट 
अन्तर्मन कैसे देता है इन सब की इजाजत 
दूसरों के दोष देखते और दिखाते भूल रहा है कि 
हम भी हो सकते हैं  कभी गलत 
प्रेम की बातें बहुत करते हैं पर खुद फैला रहे धीमा ज़हर  और नफरत 
क्या मिसाल कायम होगी जब मिट रही सच्चाई और ईमानदारी की हसरत
शान्ति और सुकून का नहीं ये पथ 
समय रहते समझ लेना हे मानव  !
शिकायत नहीं अपितु स्वीकृति और संतुष्टि से ही मिलता है अपनत्व 
सरलता और सहजता से ही हासिल हो सकता है सम्यगत्व
कि आत्म दर्शन ही है इस जीवन का आखिरी और परम सत्य 
अलका डांगी 




Friday, December 12, 2025

" मानवाधिकार "


मानव-अधिकार !! 

मानव अधिकार और हक की बातें करते हैं 
मानवता का मतलब  क्या सही मायनों में समझते हैं ?
 
अमीर-गरीब , ऊँच-नीच , काले-गोरे के भेदभाव से थोड़ा आगे जरुर बढ़े हैं 
फिर भी चाली-चुगली करना,  हँसी उड़ाना , नीचे गिराना  
इस दलदल से क्या ऊपर उठे हैं ?

मानव अधिकार और हक के नाम पर मोर्चे लेकर खड़े हैं 
नारीवाद-पुरुषवाद और सत्तावाद के  खिलाफ लड़े हैं 
फिर भी मानवता और इंसानियत के पाठ क्या हमने पढ़ें हैं  ?

समाज सेवा और मदद के लिए कई कदम चलें है
नाम और शोहरत के लिए कितने रंग बदले हैं
आधुनिकता और समानता के नाम पर सिर्फ अपने मतलब सधे हैं 
निःस्वार्थ होकर कब हम अपनों के लिए पीछे हटे हैं ?

हक के लिए बेशक लड़कर इंसान करता अपनी फरियाद है 
परंतु सच तो ये है कि 
" हर दिल में मानवता " ही मानव अधिकार की बुनियाद है |

अलका डांगी 






 

Wednesday, November 5, 2025

गाँवों का शहरीकरण. !!


गाँवों का शहरीकरण  !!

प्रकृति और संस्कृति का जहाँ होता है मिलन 
सादगी और सुकून से भरा-पूरा जीवन 
पर्वत पहाड़ियों की ऊँचाइयों का आकर्षण 
खेत खलिहानों से महकता घर आँगन 
सब कुछ धीरे-धीरे दमन हो रहा है 
कि अब गाँवों का भी शहरीकरण हो रहा है 

गाय भैंस के तबेले 
पशु पक्षियों के मेले 
मौसम अनुसार सब्जी फलों के ठेले
तीज त्योहार के मेल-मिलाप और हँसी खेले
अपनेपन का समीकरण कहीं खो रहा है 
कि अब गाँवों का भी शहरीकरण हो रहा है 

कड़ी मेहनत और शुद्ध सात्विक खान-पान 
प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक ज्ञान
स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की पहचान
आधुनिकता के नाम पर 
शहरों का अनुकरण हो रहा है 
कि अब गाँवों का भी शहरीकरण हो रहा है 

कृषि प्रधान मेरा गाँव मेरा देश 
जिसकी पहचान इसकी संस्कृति और परिभेष
महत्व जहाँ धर्म और कर्म का विशेष
पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता ने कर लिया वहाँ प्रवेश
शोर-शराबा और दिखावे की जिंदगी जीते जीते 
चेहरे पर मुस्कान है और अंतःकरण कहीं रो रहा है
कि शहरों का तो वैश्वीकरण हो रहा है 
और गांवों का शहरीकरण हो रहा है 

अलका डांगी 
 

 



 


Monday, September 15, 2025

Patriarchy - feminism या इन्सानियत ?

Patriarchy  , feminism या इंसानियत. ?

माना कि patriarchy आज भी exist करता है 
और feminism ही उसे burst करता है
सदियों से चल रही इस कुव्यवस्था के खिलाफ feminism हर दिन अपने हक की लड़ाई लड़ता है 
और स्त्रियों के वज़ूद की खातिर ये संघर्ष निरंतर चलता है 
अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जब ये धुंआ उठता है 
तभी बदलाव आता  है,  समाज सुधरता है 
और हर द्वार स्त्रीयों के लिए खुलता है 

पर patriarchy के नाम पर 
हर एक पुरुष के खिलाफ विद्रोह और नफरत की ज्वाला तो नहीं जगा सकते 
उसके हर कार्य पर patriarchy का नकाब तो नहीं चढ़ा सकते
feminism का गलत फायदा उठाकर हर पुरुष को गलत तो नहीं ठहरा सकते 
हर पुरुष को patriarchy की बलि तो नहीं चढ़ा सकते 

सदियों से चल रही patriarchy की परंपरा को 
तोड़कर बाहर निकलने का  भरसक प्रयत्न कर रहा है जो पुरुष वर्ग 
उसे दिल से जरूर अपना सकते हैं 
स्त्रियों की समानता और इज्जत को प्राथमिकता देने वाले हर पुरुष के साथ 
कदम से कदम मिला सकते हैं
प्रेम और सरलता से किसी के भी स्वाभिमान को बिना ठेस पहुंचाये 
धीरे-धीरे patriarchy को जड़ से मिटा सकते हैं 

स्वस्थ समाज के संचालन में स्त्री-पुरूष दोनों ही 
एक रथ के  दो पहिये हैं 
जो ज़ंग से नहीं अपितु संग और संतुलन से चला सकते है 
विद्रोही बनकर नहीं बल्कि परिस्थतियों को समझकर साथ निभा सकते है
सारे पूर्वाग्रह मिटा स्त्री पुरुष की समानता का सभी को परिचय  करा सकते हैं |
फिर patriarchy और feminism से ऊपर उठकर इन्सानियत का एक हसीन जहान बना सकते हैं 


अलका डांगी 









Friday, August 15, 2025

आजादी !

आजादी !

यह आजादी कहाँ इतनी आसान थी 
देश भक्तों और शूरवीरों का बहुत मुश्किल भरा इम्तिहान थी यह आजादी कहाँ इतनी आसान थी 
बरसों तक सरजमीं इस गूँज के लिए परेशान थी 
यह आजादी कहाँ इतनी आसान थी 

मातृ-भक्तों ने भारत माँ को सर्वोपरि चुना 
धन्य वो माताएँ जिन्होंने उन सबको जना 
जिनके रक्त के कण-कण में स्वतंत्रता और आजाद देश का बसा था सपना 
जीने-मरने की सुध कहाँ - ये लड़ाई तो देश के स्वाभिमान और सम्मान की थी 
ये आजादी कहाँ इतनी आसान थी
 
अंग्रेजों और मुगलों की हुकूमत को नेस्तनाबूद करना 
शोषण और अत्याचार की जंजीरों से देश वासियों को मुक्त करना 
अपनी संस्कृति और धरोहर की रक्षा करना 
उन वीरों के व्यक्तित्व की यही पहचान थी 
ये आजादी कहाँ इतनी आसान थी 

भारत माता की स्वतंत्रता देश भक्तों और वीरों का बलिदान थी 
यह व्यर्थ न जाए - बात है अब हम सबके भविष्य और कल्याण  की 
भारत की सभ्यता और अनमोल विरासत की पूँजी अब हाथ में है हर नौजवान की 
आजादी  , आजादी और आजादी. !! यह लड़ाई है  स्वतंत्रता स्वाधीनता और अधिकार की  
धरती पर हर इन्सान की 
सबके आत्मसम्मान की 

अलका डांगी